चार साल पहले तुलसीघाट स्थित प्राचीन तुलसी मंदिर से आज ही के दिन श्रीरामचरित मानस की तुलसीकृत पांडुलिपि चोरी हुई थी।
करीब चार सौ साल पुरानी इस दुर्लभ पांडुलिपि को पुलिस ने सात महीने बाद बरामद कर इस प्रकरण का पटाक्षेप कर दिया लेकिन इससे दुर्लभ पांडुलिपियों के संग्रह की एक नई शुरुआत हुई। जो आज पांडुलिपियों के बड़े खजाने के रूप में तब्दील हो चुकी है।
चार सालों में देश भर से 1600 पांडुलिपियां संग्रहीत की जा चुकी हैं। इन्हें तुलसी मंदिर में कड़ी सुरक्षा निगरानी में रखा गया है। इन्हें रखने के लिए पासवर्ड से खुलने वाली विशेष तरह की बुलेटप्रूफ आलमारी बनवाई गई है। चौबीसों घंटे निगरानी के लिए दस सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। ये सभी पांडुलिपियां जल्द ऑनलाइन की जाएंगी।
बुलेटप्रूफ आलमारी में रखी गई हैं दुर्लभ पांडुलिपियां
22 दिसंबर 2011 को प्राचीन तुलसी मंदिर का ताला तोड़कर दुर्लभ पांडुलिपि और चांदी की हनुमान प्रतिमा चुरा ली गई थी। चोरी में अंतरराष्ट्रीय तस्करों का हाथ बताया गया था। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां भी जांच में जुटी थीं।
जुलाई 2012 में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर उस पांडुलिपि और मूर्ति को बरामद कर लिया था। तभी घटना से आहत संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभरनाथ मिश्र और उनके परिवार ने तुलसी घाट पर दुर्लभ पांडुलिपियों का संग्रह करने का निश्चय किया।
महंत के अनुज प्रो. विजय नाथ मिश्र और पांडुलिपि विशेषज्ञ उदय शंकर दूबे ने तुलसीकृत पांडुलिपियों को हासिल करने के लिए देश भर की खाक छानी। चार साल में अब तक 1600 पांडुलिपियां यहां संग्रहीत की जा चुकी हैं।
पांडुलिपियों को ऑनलाइन करने की चल रहीं तैयारियां
इनमें कुछ पांडुलिपियां लोगों से दान में ली गईं तो कुछ खरीदी भी गईं। आम लोगों तक पहुंचाने के लिए अब उन्हें ऑनलाइन करने की तैयारी है। करीब दस हजार पन्नों को ऑनलाइन करने प्रक्रिया पर तेजी से काम चल रहा है।
- संग्रहालय में तुलसीकृत 133 पांडुलिपियां
संग्रहालय में मौजूद 1600 पांडुलिपियों में 133 पांडुलिपियां तुलसीकृत हैं। इनमें कवितावली, गीतावली, रामचरित मानस, बरवै रामायण, उर्दू रामायण, फारसी रामायण, हनुमान चालीसा, अवध विलास प्रमुख हैं।
- 17 वर्षों तक तुलसीघाट पर रहे तुलसीदास
जानकारों का मानना है कि गोस्वामी तुलसीदास 1663 में काशी पहुंचे थे। यहां वह करीब 17 साल तक रहे। तुलसीघाट पर रहने के दौरान उन्होंने कई रचनाएं कीं। काशी में उन्हें लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। अवधी में उनकी रचनाएं होती थी। कुद लोग चाहते थे कि वह संस्कृत में रचना करें। कई बार लोगों ने पांडुलिपियां फाड़कर गंगा में बहा दी थीं।