मिलना और मिलकर फिर से बिछड़ना, यही भारतीय राजनीति में समाजवादी कुनबे का इतिहास रहा है और यही इनकी पहचान भी।
फिर से एक हुआ जनता परिवार अतीत में दर्जनों बार टूट चुका है। अलग-अलग गुट के नेता अलग-अलग पार्टी बना चुके हैं। सियासी संकट के समय समाजवादी कुनबे ने सारे मतभेदों को ताक पर रखकर एक होने और सत्ता हासिल होते ही अलग-अलग राह पकड़ने में देर भी नहीं लगाई।
बीते चार दशक में एक दर्जन से भी अधिक बार टूटने का इतिहास इसका गवाह है। बहरहाल बिहार विधानसभा चुनाव एक हो चुके जनता परिवार के लिए लिटमस टेस्ट होगा।
बिहार में जीत जहां जनता परिवार के लिए संभावनाओं के नए मार्ग खोलेगी तो हार पर इसके बिखरने की। बिहार में जीत के बाद बीजद और रालोद भी नए दल में शामिल हो सकते हैं तो तृणमूल कांग्रेस भी नई सियासी परिस्थितियों में इन कुनबे पर डोरे डाल सकती है।
बिहार चुनाव में होगा लिटमस टेस्ट
वर्ष 1977 में यह कुनबा जनसंघ समेत तब एक हुआ जब उसे आपातकाल लगाने वाली इंदिरा गांधी सरकार से दो-दो हाथ करने थे। हालांकि पहली बार सत्ता हासिल करने के महज तीन साल के अंदर इसमें शामिल दलों ने अपनी अलग राह चुन ली।
1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रयास से लोकसभा में राजीव गांधी के नेतृत्व में सबसे बड़ी जीत हासिल करने वाली कांग्रेस के खिलाफ लोकदल, कांग्रेस एस और जनमोर्चा ने जनता दल का चोला पहना। मगर करीब एक साल बाद ही चंद्रशेखर और वीपी के मतभेद के बाद जनता दल बिखर गया।
नब्बे के दशक में समाजवादी कुनबे की कई पार्टियों का जन्म हुआ। चंद्रशेखर ने सजपा बनाई तो मुलायम सिंह यादव ने सपा। इसी तरह जार्ज ने समता पार्टी बनाई तो अजित सिंह ने रालोद।
जीते तो ठीक नहीं तो फिर से बिखरना तय
दिग्गज नेता रामकृष्ण हेगड़े ने लोकशक्ति, लालू प्रसाद ने राजद, एचडी देवगौड़ा ने जदएस, रामविलास पासवान ने लोजपा का गठन कर अपनी नई राजनीतिक राह पकड़ी। नई सदी के पहले दशक में समता पार्टी को भंग कर जदयू अस्तित्व में आया।
इस बार के विलय के पीछे भी समाजवादी कुनबे के सामने अस्तित्व का संकट ही सबसे बड़ा कारण है। बीते लोकसभा चुनाव में अलग-अलग लड़ कर यह कुनबा विभिन्न राज्यों में हासिल हुई करारी हार के बाद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
जाहिर है कि इस विलय के सामने बिहार विधानसभा चुनाव पहली और सबसे बड़ी सियासी चुनौती साबित होगी। जीत जहां समाजवादी कुनबे को नई ऊर्जा से लबरेज करेगी, वहीं हार इस कुनबे की एकता की पोल खोलेगी।
समाजवादी कुनबे का इतिहास
1977: जेपी ने कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल और जनसंघ को मिला कर बनाई जनता पार्टी
1980: जनता पार्टी से अलग हुआ जनसंघ, भाजपा का जन्म
1989: वीपी सिंह की अगुवाई में जनता पार्टी, जनमोर्चा और लोकदल का विलय कर बना जनता दल
1991: मतभेद के बाद चंद्रशेखर ने बनाई सजपा
1992: मुलायम ने बनाई सपा
1992: चौधरी अजित सिंह ने बनाई रालोद
1994: जार्ज की अगुवाई में बनी समता पार्टी
1995: रामकृष्ण हेगड़े ने बनाई लोकशक्ति
1997: लालू प्रसाद ने बनाई राजद
1998: ओमप्रकाश चौटाला ने बनाई इनेलो
1998: नवीन पटनायक ने बनाई बीजद
1999: एचडी देवगौड़ा ने बनाई जदएस
2000: रामविलास पासवान ने बनाई लोजपा
2003: जदयू आया अस्तित्व में
2015: फिर साथ साथ हुई सपा, सजपा, जदयू, राजद, इनेलो और जदएस