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पक्षियों को गोली सी लगती है पटाखों की आवाज

Sat, 10 Nov 2012 08:02 AM IST
हरिद्वार/योगेश योगी
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जिन पटाखों की आवाज सुनकर इंसानों के बच्चे तालियां बजाते हैं वह आवाज पक्षियों के बच्चों की जान तक ले लेती है। दिवाली पर आतिशबाजी से होने वाली तेज आवाज से कई नन्हें पक्षियों की मौत हो जाती है। यही नहीं प्रदूषण के चलते 25-30 फीसदी पक्षियों का श्वसन तंत्र भी प्रभावित हो जाता है। गुरुकुल कांगड़ी के एक प्रोफेसर के शोध से पता चला है कि 90 डेसीबल से ज्यादा ध्वनि पक्षियों के लिए बेहद खतरनाक होती है।
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सर्द ऋतु के प्रारंभ में ही अधिकतर पक्षियों का प्रजनन काल पूरा हो जाता है। इस समय पक्षियों के घोंसलों में छोटे-छोटे बच्चे हैं। गौरैया, मैना, कौआ, तोता, पाइड बुशचैट आदि पक्षी शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में आबादी के आसपास ही घोसला बनाते हैं। इसमें मादा पक्षी अपने नन्हें-मुन्ने बच्चों को पाल रही होती हैं। लेकिन उन बेचारों को तो जरा भी आभास नहीं होता कि उनके लिए खौफनाक रात भी आने वाली है।

गुरुकुल कांगड़ी विवि के प्रोफेसर अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक डा. दिनेश भट्ट का कहना है कि दिवाली की रात तेज आवाज वाले पटाखे चलाए जाते हैं। यह आवाज कई नन्हें पक्षी सहन नहीं कर पाते और दहशत से उनकी मौत तक हो जाती है। पिछले वर्षों में इस तरह के कई मामले देखने में आए हैं। व्यस्क पक्षी भी पटाखों की तेज आवाज से सहमे रहते हैं। तेज आवाज के साथ ही वायु प्रदूषण का पक्षियों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। दिवाली के बाद 25-30 प्रतिशत पक्षियों के श्वसन तंत्र पर प्रभाव देखा जा सकता है।
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पालतू जानवरों पर भी पड़ता है बुरा प्रभाव
दिवाली पर आतिशबाजी का शोर गांव की अपेक्षा शहरों में ज्यादा होता है। प्रो. दिनेश भट्ट का कहना है कि शहर में पालतू जानवरों पर भी पटाखों के शोर और वायु प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ता है। कुत्ते, गाय-भैंस आदि पशुओं में दिवाली की रात बेचैनी स्पष्ट देखी जा सकती है। उनके फेफड़ों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।
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