राजनीति में कभी अपमान की खेती नहीं की जाती है। यह आपको बिना कुछ कहे ही नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है। यह स्थिति बेहोशी की तरह होती है। इस स्थिति में आपने जो कहा होता है उसको बाहर क्या असर हो रहा है इसके बारे में आप नहीं जान पाते या फिर अनुभव कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में बाहर की परिस्थितियों के असर में जान नहीं पाते हैं। अपमान की राजनीति का क्या असर होता है इसका एक छोटा उदाहरण नरेंद्र मोदी ने दिल्ली विधानसभा में अनुभव किया होगा। वह भाग्यशाली है क्योंकि वह समय के लिए बिल्कुल सही है।
इतिहास के पन्नों को पलट कर देंखे तो पता चलता है कि कई नेताओं इस तरह के तरीकों को अपनाया था। इस तरह की चीजें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय बड़े पैमाने पर होती थी जब भारत की राजनीति बिल्कुल विकेंद्रित थी। लोकसभा चुनावों के बाद विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी ने इंदिरा गांधी की शैली को अपनाया। पर दिल्ली ने उस शैली पर रोक लगा दी। ऐसे समय में जब युवा मतदाताओं का धैर्य कम है। टेक्नोलॉजी ने समय, स्थान और धैर्य सबको संकुचित कर दिया है। तब की राजनीति में इंदिरा भारत है, भारत इंदिरा है जैसे नारे की कल्पना नहीं की जा सकती है।
प्रधानमंत्री बनने के बाद सोशल मीडिया से मोदी के सर्मथकों की भीड़ एक दम से गायब हो गई है। सोशल मीडिया पर मोदी सर्मथकों की वह भीड़ जो लोकसभा चुनाव के दौरान देखी गई थी। वह समर्थक कहां गायब हो गए हैं किसी को भी पता नहीं है। क्या मोदी बहुत जल्दी बहुत ज्यादा बोल गए हैं? आने वाले दिनों में इस तरह से प्रश्न और तेजी से उठेंगे।
महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों में मिली जीत के बाद, हाल के महीनों नरेंद्र मोदी और अमित शाह को इस बात का एहसास हो चुका होगा कि वह किसी तरह की बॉडी लैंग्वेज का प्रयोग कर रहे हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान दिए गए दो भाषण इस बात की तरफ इशारा करते हैं। मोदी ने दिल्ली की जनता से जब कहा कि लोग उन्हें वोट करें क्योंकि वह लोगों के लिए भाग्यशाली साबित हो चुके हैं। मोदी ने इस तरह की बात की जो नेता कभी-कभार ही कहते हैं। इस तरह की बात राहुल गांधी ने अपने बहुचर्चित टाइम्स नाऊ को दिए गए इंटरव्यू में कही थी।
जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों के अपनी पहली रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि हमारी सरकार ही सिर्फ सेना की तरफ से गलत रुप से एनकांउटर में मारे गए लोगों को लेकर माफी मांगने की हिम्मत दिखा सकती है।
विधानसभा चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री के बढ़ती लोकप्रियता ने उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने का अधिकार दे दिया और मोदी के आसपास के कुछ करीबी सलाहकारों ने इसे एक तरह के भ्रम में बदल दिया है।
जिस तरह से भाजपा के नेताओं ने अध्यादेशों और संसद के संयुक्त सत्र को लेकर व्यवहार किया उससे लगता है कि कुछ भी करने पर अपने प्यारे प्रधानमंत्री को लोग माफ कर देंगे। कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आस-पास ऐसा माहौल बना दिया जिससे उन्हें लगने लगा कि लोग एक अर्द्धसत्तावादी नेता को पसंद करने लगे हैं। यह मोदी और अमित शाह की बड़ी गलती थी।
भारतीय लोकतंत्र में किसी तरह की तानाशाही को मंजूरी देने के लिए इसका राजनीतिक तंत्र काफी दूर है। दिल्ली में भाजपा की हार के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की टिप्पणी ने कि यह हार मोदी की है। यह दर्शाता है कि किस तरह से अमित शाह ने शिवसेना के साथ व्यवहार किया था। अमित शाह पूरे देश के कई राज्यों में एक नेता के रूप में मोदी को स्थापित करने के काम में लगे हुए थे जहां पर कई दशकों से वहां की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां की जड़े जमी हुई थी। राज्यसभा में बहुमत पाने के लिए इस तरह का अभियान शुरू किया गया था।
अमित शाह की पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा राज्यों के राजनीतिक माहौल में किए गए आक्रामक हमलों के कारण ही कुछ दूसरे नेताओं ने राष्ट्रीय मुद्दों पर आप के साथ काम करने का फैसला किया है।
कई राष्ट्रीय मुद्दों पर अब भाजपा को घेरने की तैयारी हो रही है। भूमि अधिग्रहण बिल उन्हीं बिलों में से एक है। ध्यान देने वाली बात है कि आगामी बजट सत्र में विपक्षी पार्टियों की एकता फिर से सामने आ सकती है। मोदी और शाह पिछले कुछ महीनों में अपनी बहुत सी जमा पूंजी गंवा चुके हैं। राजनीतिक घमंड ही वर्तमान परिस्थितियों के लिए दोषी है। भाजपा के अंदर नेता भी मानते हैं कि अब भाजपा में भी निर्णय लेने की राजनीति मोदी-अमित शाह केंद्रित हो चुकी है।
दिल्ली के चुनाव मोदी के लिए एक बड़ा संदेश है। इस संदेश के जरिए मोदी अपने काम करने के तरीके पर सोच सकते हैं। साथ ही उसकी समीक्षा कर सकते हैं। दिल्ली चुनावों को देखकर भी मोदी ने अगर अपनी प्रशासनिक शैली में बदलाव नहीं किया तो जिस जाल में वह फंसे हैं उसमे वह फंसे ही रहेगे।