देश की मशहूर कथक नृत्यांगना सितारा देवी का मंगलवार को देर रात मुंबई के जसलोक अस्पताल में निधन हो गया। वह 94 वर्ष की थीं। पेट में दर्द की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
काशी के कबीरचौरा की गलियों में पली ‘धन्नो’ मुंबई की फिल्मी दुनिया का ‘सितारा’ बनकर छा गईं। धनतेरस के दिन पैदा होने से माता-पिता ने नाम धनलक्ष्मी रखा और प्यार से उन्हें धन्नो कहते थे, उन्हें दुनिया सितारा देवी के नाम से जानती है। उनके कथक की कोई सानी नहीं थी।
बनारस घराने से कथक की महारत हासिल कर उन्होंने इस नृत्य को विश्व पटल तक पहुंचाया ही, अपनी कला को शिष्यों में बोकर उन्होंने उसे पुष्पित-पल्लवित भी किया। उनको जानने वाले कहते हैं कि उन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। जब भी मान को ठेस लगी उसका बेबाक जवाब भी दिया। देर से पद्म अलंकरण देने से खफा होकर वर्ष 2003 उन्होंने पद्मविभूषण को ठुकरा दिया था।
वर्ष 1933 में बॉलीवुड से काशी आए फिल्म निर्माता निरंजन शर्मा को एक ऐसी अदाकारा की तलाश थी जिसमें नृत्य के साथ ही सुरीले गायन की भी प्रतिभा हो। कबीर चौरा में उनकी नजर उन दिनों कथक नर्तक पं. सुखदेव महाराज की सबसे छोटी पुत्री धन्नो के हुनर पर पड़ी। बेटी का भविष्य संवारने के लिए चिंतित पिता सुखदेव ने धन्नो को फिल्म में काम करने के लिए मुंबई भेजने के आग्रह को स्वीकार करने में तनिक भी देरी नहीं लगाई। बुजुर्गों को अब भी याद है, जब महज 13 साल की उम्र में धन्नो को फिल्म की शूटिंग के लिए मुंबई रवाना करने मोहल्ले के बच्चे-महिलाएं तक स्टेशन गए थे।
सितारा देवी ने निरंजन की पहली फिल्म ‘वसंत सेना’ में नृत्यांगना के तौर पर अभिनय की शुरुआत की। इसके बाद फिल्मों में कोरियोग्राफी के जरिये भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी, वहीं कथक नृत्य को दुनिया में विशिष्ट पहचान भी दिलाई।
सितारा ने की दो शादियां
नृत्यांगना सितारा ने दो शादियां की थीं। पहली शादी उन्होंने फिल्म मुगले आजम के निर्देशक आसिफ से की लेकिन यह रिश्ता कम समय में ही टूट गया और उन्होंने तलाक ले लिया।
दूसरी शादी उन्होंने ‘डॉन’ फिल्म के निर्माता कमल बरोट के भाई प्रताप बरोट से की। प्रताप के साथ मुंबई के नेपेंसी रोड इलाके में घर बसाने के बाद उन्होंने एक पुत्र रंजीत बरोट को जन्म दिया। बहू माया और पोती मल्लिका बरोट भी उनके साथ ही रहते थे। सितारा देवी के शिष्य विशाल कृष्ण ने बताया कि 16 साल की उम्र में कोलकाता के शांति निकेतन में एक संगीत प्रस्तुति के दौरान उनके नृत्य से प्रभावित होकर गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें ‘कथक क्वीन’ की उपाधि दी थी। कथक नृत्य में उनकी मयूर की गत, थाली की गत, जटायु मोक्ष, गत निकास की प्रस्तुति बेमिसाल थी।
उन्होंने मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान लगातार 11:30 घंटा तक नृत्य करने का रिकार्ड भी बनाया था। सितारा देवी का जन्म 1920 में कोलकाता के नाथुन बाजार में हुआ था। पांच साल की उम्र में वह बनारस पैतृक आवास बनारस के कबीरचौरा आ गई थीं।
फिल्मों में मिली सितारा के अभिनय को पहचान
सिने तारिका के रूप में भी सितारा देवी ने बालीवुड में अपनी खास जगह बनाई थी। 1935 में फिल्म ‘वसंत सेना’ से अपने कॅरियर की शुरुआत करने वाली इस नृत्यांगना ने दर्जन भर से अधिक फिल्मों में अपने अभिनय से सिने दर्शकों के बीच लोकप्रियता अर्जित की।
सितारा देवी को वर्ष 1940 में फिल्म ‘उषा हरण’ से पहचान मिली। तब उनकी उम्र 20 साल थी। इसके बाद तो एक के बाद एक फिल्मों के ऑफर उनके पास आने लगे। 1951 में ‘नगीना’, 1954 में ‘रोटी’ के बाद ‘वतन’, 1957 में ‘अंजलि’ में उन्होंने बतौर नायिका काम किया। उस जमाने की हिट फिल्म ‘कोहिनूर’ के गीत मधुवन में राधिका नाची रे... पर नृत्य की कोरियोग्राफी भी उन्होंने की थी। फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के गीत मुझे पनघट पे नंदलाल छोड़ गयो रे...की भी नृत्य कोरियोग्राफी सितारा देवी ने की थी। फिल्म ‘हलचल’, ‘आबरू’, ‘नजमा’ के बाद ‘मदर इंडिया’ में उनके अभिनय को खूब पसंद किया गया।
पूरा परिवार था नृत्य साधना के प्रति समर्पित
कथक नर्तक पं. सुखदेव मिश्र की पांच संतानों में से एक थीं नृत्यांगना सितारा देवी। उनकी बहनों में सबसे बड़ी अलकनंदा और उनके बाद तारा देवी भी उस दौर की मशहूर नृत्यांगनाओं में शुमार थीं। उनके दोनों भाई दुर्गा प्रसाद मिश्र और चतुर्भुज मिश्र भी नृत्य साधना से जुड़े रहे।