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पंजाब में सिद्धू ने भाजपा आलाकमान को डाला उलझन में

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पंजाब में पूर्व क्रिकेटर और पूर्व सांसद नवजोत सिंह सिद्धू ने भाजपा आलाकमान को उलझन में डाल दिया है। दरअसल पार्टी आलाकमान इस चुनावी राज्य में सिद्धू को संगठन की कमान देने का इच्छुक हैं। बुधवार को हुई पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में भी उनके नाम पर सहमति बनी। मगर मुश्किल यह है कि सिद्धू अकाली दल से संबंध तोड़े बिना संगठन की कमान संभालने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं।
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सिद्धू की शर्त के बाद एक तरफ जहां उन्हें मनाने की कोशिशें तेज हुई हैं, वहीं आलाकमान नई रणनीति पर भी गंभीर विचार विमर्श कर रहा है। साल 2014 में लोकसभा के बाद 4 राज्यों में ताबड़तोड़ सरकार बनाने के बाद भाजपा नेतृत्व ने महाराष्ट्र की तर्ज पर पंजाब में भी अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरने को ले कर मंथन शुरू किया था।

हालांकि वर्ष 2015 में दिल्ली और बिहार में मिले चुनावी झटके के बाद पंजाब को ले कर नेतृत्व रक्षात्मक हो गया । अब सिद्धू की शर्त के बाद पार्टी में शीर्ष स्तर पर फिर से राज्य में अकेले आगे बढ़ने की संभावनाओं पर फिर से विचार विमर्श शुरू हुआ है। गौरतलब है कि पंजाब में इस साल दिसंबर या नए साल के जनवरी महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं।
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अकाली दल से तोड़ना होगा नाता

पार्टी के अतिविशिष्ट सूत्र के मुताबिक प्रधानमंत्री की उपस्थिति में बुधवार को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में पंजाब की स्थिति पर गंभीर चर्चा हुई। बोर्ड के सभी सदस्य नई राजनीतिक परिस्थितियों में सिख चेहरा के रूप में सिद्धू के नाम पर दांव लगाने पर सहमत थे। सिद्धू को नेतृत्व की इस इच्छा से अवगत कराया गया।

सूत्रों का कहना है कि पूर्व किक्रेटर ने दो टूक शब्दों में कहा कि संगठन की कमान वह तभी संभालेंगे जब पार्टी अकाली दल से नाता तोड़ेगी। बताते हैं कि पार्टी प्रभारी प्रभात झा ने सिद्धू की शर्त से पार्टी नेतृत्व को अवगत करा दिया है। गौरतलब है कि इस पद की दौर में वर्तमान अध्यक्ष कमल शर्मा, विधायक अश्विनी शर्मा और राजस्थान के प्रभारी के साथ पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अविनाश राय खन्ना शामिल हैं।
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नशे के फैलते कारोबार से अकाली दल से नाराजगी

पार्टी ने बीते छह महीने में राज्य का दो बार आंतरिक सर्वे कराया है। इस सर्वे से सामने आया है कि सूबे में फैले नशे केजाल के कारण लोग अकाली दल से बेहद नाराज हैं। ऐसे में सहयोगी होने के कारण भाजपा को भी इसका नुकसान उठाना पड़ेगा। खासतौर से प्रधानमंत्री पंजाब में युवाओं के नशे के गिरफ्त में आते जाने से खासे नाराज हैं।

आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में भी इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। इस कारण भाजपा-अकाली गठबंधन को राज्य में बड़ी सफलता हासिल नहीं हो पाई थी। ऐसे में सिद्धू की शर्त के बाद नेतृत्व फिर से राज्य में अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरने की दिशा में मंथन शुरू हुआ है।

पंजाब में अध्यक्ष पद के लिए विचार विमर्श का दौर जारी है। जल्द ही अंतिम निर्णय हो जाएगा। जहां तक सिद्धू को अध्यक्ष पद देने का सवाल है तो मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करुंगा।
प्रभात झा, प्रभारी, पंजाब भाजपा
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