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कभी उभर रहे थे ये सितारे, अब गर्दिश में मिल गए

Thu, 09 Apr 2015 08:28 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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कितनी विडंबना है जिन सितारों को गोल्ड मैडल पाते हुए, फलक पर चमकते हुए अखबार की सुर्खियां बनना था, वो दूसरों के घरों के बर्तन मांजते, मजदूरी करते और रिक्शा चलाते दिख रहे हैं।
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सरकारों की बेरुखी कहिए या व्यवस्था में कमी, इन सितारों ने खेल के आसमान पर भरपूर चमकने से पहले ही गलियों की धूल में अपनी चमक खो दी। कारण कुछ भी रहे हों लेकिन इनकी गदिर्शी कई सवाल पैदा करती है।

कायदे से जिन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को हमें प्रोत्साहन देकर विश्व प्रसिद्ध बनाना चाहिए था वो पेट भरने की रेस में दौड़ रहे हैं। खेल के नजरिए से देखा जाए तो शायद इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता।
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मुक्केबाजी में गोल्ड मैडलिस्ट बनी नौकरानी

मुक्केबाजी में हरियाणा स्टेट चैंपियन और नेशनल गोल्ड मैडलिस्ट रिशू मित्तल आजकल दूसरों के घरों में चौका बर्तन करके पेट पाल रही है। सरकारी मदद मिलना तो दूर एक साल पहले राष्ट्रीय खेलों में शामिल हो चुकी रिशू को कोई पहचानता भी नहीं है।

रिशू का कहना है कि दो साल पहले रिशू की मां का निधन हो गया था, उसके बाद रिशू को अपने भाई और अपना पेट भरने के लिए घरों में मेड का काम पकड़ना पड़ा। 46 किलोग्राम वेट कैटेगरी में हरियाणा की स्टेट चैंपियन रह चुकी रिशू एक दुकान में अस्थायी तौर पर रहती है और घरेलू मेड का काम करती है।

रिशू के कोच का कहना है कि वो मजबूर है कि एक प्रतिभाशाली बच्ची को सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही। उन्होंने कहा कि अगर रिशू को अच्छी डाइट और सही गाइडेंस मिले तो वो विश्व स्तर की मुक्केबाज बन सकती है लेकिन सरकार को रिशू की माली हालत की कोई चिंता ही नहीं है।

इसे रिशू की हिम्मत और महत्वकांक्षा ही कहिए कि इतनी तंगी के बीच भी वो पढ़ाई जारी रखे हुए है। रिशू दसवीं की पढ़ाई कर रही है और मेड के काम के बाद जो वक्त बचता है, उस दौरान एक्जाम की तैयारी करती है।

गोल गप्पे बेच रही ओलंपियन एथलीट

2011 में एथेंस स्पेशल ओलंपिक में दो बार कांस्य पदक जीत चुकी एथलीट सीता साहू आजकल गोल गप्पे बेच रही हैं। कारण वही -पेट भरने की जद्दोजहद।

मध्य प्रदेश के रीवा में 15 साल की ओलंपियन सीता साहू अपना और घरवालों का पेट भरने के लिए सुबह पांच बजे उठकर गोलगप्पे और पापड़ी तैयार करती है। दिन भर चाट का सामान तैयार करने के बाद सीता अपने छोटे भाई के साथ उसे हाथ गाड़ी पर लादती है और निकल पड़ती है सड़कों पर चाट बेचने को।

सीता का कहना है कि रिले रेस में जीता कांस्य पदक उसके घर के छह सदस्यों का पेट भरने को काफी नहीं था। उसे सरकार की तरफ से मदद भी ‌नहीं मिली। पिता शारीरिक रूप से अक्षम हैं और उसके छोटे छोटे चार भाई बहन हैं जिनका पेट भरने के लिए उसे गोलगप्पे बेचने पड़ते हैं।

सीता को याद नहीं कि उसने आखिरी बार एक गिलास दूध कब पिया था। घर के सदस्यों ने पेट भर भोजन कब किया, किसी को याद नहीं। सीता को इतना पता है कि वो कभी दौड़ती थी, देश के लिए भी दौड़ा लेकिन वो दौड़ बेकार हो गई क्योंकि पेट भरने की दौड़ में सीता काफी पीछे रह गई है।

सीता के कोच का कहना है कि सीता एक बड़ी एथलीट बन सकती थी लेकिन गरीबी के चलते सीता हार गई। एथेंस से मैडल लेकर लौटे खिलाड़ियों को मध्य प्रदेश सरकार ने एक लाख, 50 हजार और 25 हजार रुपए का प्राइज देने की घोषणा की थी लेकिन वो प्राइज आज तक नहीं मिला।

कबड्डी खिलाड़ी बेच रही सब्जी

40 साल की पूर्व कबड्डी खिलाड़ी शांति देवी अपने चार बच्चों का पेट भरने के लिए सब्जी भाजी बेचती है। शांति को याद है कि वो 80 के दशक में नेशनल कबड्डी चैंपियनशिप में लगातार तीन साल बिहार की टीम में खेली थी।

जानकार बताते हैं कि शांति देवी बेहतरीन कबड्डी प्लेयर थी लेकिन जिंदगी ने उन्हें खेल के मैदान से उठाकर सब्जी मंडी में बैठा दिया।

शांति के घर खाने के ऐसे लाले पड़े कि बच्चे स्कूल से निकाल दिए गए और खाने को भोजन तक नहीं था। तब शांति ने खेल को दरकिनार करके जमशेदपुर की एक सब्जी मंडी में मौसमी सब्जी और फल बेचने का काम शुरू किया।

ऑल इंडिया वुमेन नेशनल कबड्डी टीम में कांस्य जीत चुकी शांति देवी को इस बात का मलाल है कि सरकार ने उनकी मदद नहीं की। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती तो उन्हें छोटी मोटी नौकरी दे सकती थी जिसकी मदद से वो परिवार पाल लेती।

आलम ये है कि शांति देवी ने अपने मैडल कहीं छुपा कर रख दिए हैं ताकि बच्चे उन्हें देखकर सवाल न पूछें। शांति का कहना है कि वो नहीं चाहती कि उनके बच्चे भी खेल में जाएं और उन्हें भी वो दिन देखना पड़ा जो वो देख रही हैं।

नउरी मुंडु ने ताक पर रख दिया अपना करियर

19 बार हॉकी गरीबी के चलते ही 33 साल की नउरी मुंडु ने हॉकी प्लेयर बनने का सपना ताक पर रख दिया। अपना कैरियर याद करते हुए मुंडु बताती है कि 1995 में खुद बिहार के चीफ मिनिस्टर लालू यादव ने उन्हें बिहार की बेस्ट हॉकी प्लेयर के खिताब से नवाजा था।

इसके कई साल बाद तक मुंडु हॉकी के क्षेत्र में बिहार का नाम रौशन करती रही। स्टेट लेवल के अलावा मुंडु ने नेशनल लेवल पर भी अच्छा प्रदर्शन किया और रजत पदक जीता। 2008 तक मुंडु देश के लिए खेलती रही लेकिन उन्हें पदकों के अलावा कुछ न मिला।

14 लोगों के परिवार को पालने के लिए उनके पास आय का कोई जरिया नहीं था। लिहाजा खेल को तिलांजलि देकर उन्होंने झारखंड के कुंटी जिले में एक गैर सरकारी स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली। टीचर की नौकरी से मुंडु को पांच हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं लेकिन बड़ा परिवार होने के चलते ये पैसे कम पड़ते हैं और मुंडु को दूसरों की जमीन पर खेती करनी पड़ती है।

फिटर का काम कर रहा लिफ्टर

पावर लिफ्टिंग में विश्व रिकार्ड बना चुके बीजाराम आजकल लोगों के घरों में बिजली फिटिंग करके घर का खर्च उठा रहे हैं। बीजा राम ने 1990 से 2008 तक लगभग ग्यारह बार पावर लिफ्टिंग के क्षेत्र में स्ट्रांगमैन का खिताब जीता है।

इतना ही नहीं कर्नाटक में उन्होंने 52 किलोग्राम भार वर्ग में 240 किलोग्राम वजन उठाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन यही बीजाराम अपनी गरीबी से ऊपर नहीं उठ पा रहे और फिटिंग के अलावा वो मटके बेचकर परिवार का पेट पालते हैं।

बीजाराम का कहना है कि एक बार उन्हें राज्य सरकार की तरफ से सात हजार रुपए का इनाम मिला था। तब उन्हें लगा था कि सरकार आगे भी मदद करेगी और वो ज्यादा जोश से पावर लिफ्टिंग की प्रेक्टिस में जुट गए थे।

जीतोड़ मेहनत और जज्बे के बावजूद बीजाराम को सरकारी स्तर पर कोई मदद नहीं मिली और नौकरी की उम्मीद भी पूरी नहीं हो पाई।

निशा रानी दत्त नहीं कमा पाईं पैसा

21 साल की प्रतिभाशाली आर्चर(तीरंदाज) निशा ने अपनी तीरंदाजी ने न केवल देश बल्कि विदेश में भी खूब नाम कमाया लेकिन रुपया न कमा पाई। वजह, सरकारी उदासीनता।

ताइवान और बैंकॉक में देश के नाम कई पदक करने वाली निशा ने तीरंदाजी केवल इसलिए छोड़ दी क्योंकि उसके घर के लोगों को खाने के लाले पड़ रहे थे और ऐसे में वो तीरंदाजी पर फोकस नहीं कर पाई।

निशा के पिता किसान हैं और ‌कभी कभी इतनी तंगी होती है कि फसल के लिए बीज तक नहीं खरीद पाते। ऐसे में निशा के प्रशिक्षण पर होने वाले खर्च को वो उठा नहीं पाए।

उनकी बीमारी ने निशा को और तोड़ दिया और उसे टाटा आर्चरी अकैडमी में पांच सौ रुपए प्रतिमाह स्टाइपंड पर नौकरी करनी पड़ी। परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए निशा बंगलूरू भी गई और वहां उन्होंने मित्तल चैंपियन ट्रस्ट में काम करके 3000 रुपए भी कमाए लेकिन ये रुपए पर्याप्त नहीं थे।

निशा बताती है कि तंगी के दिनों ढह गए कच्चे मकान को ठीक कराने के लिए उसे अपना चार लाख रुपए की कीमत का तीर कमान मात्र पचास हजार रुपए में बेचने को मजबूर होना पड़ा। उसे सरकार की तरफ से उम्मीद खत्म हो चुकी है।

मात्र 21 साल की उम्र में निशा तीरंदाजी को अलविदा कह चुकी है और पंजाब नेशनल बैंक में नौकरी कर रही है। निशा का कहना है कि खेल ने उसे कुछ नहीं दिया और वो इसी नौकरी को करती रहेगी।

रिक्शा चलाता है बैडमिंटन खिलाड़ी

2011 में 55 साल के उम्र वर्ग में वर्ल्ड मास्टर बैडमिंटन चैंपियनशिप में भारत का नेतृत्व करने वाले हेमराज वर्मा आजकल रिक्शा चलाकर परिवार का गुजारा कर रहे हैं।

हेमराज वर्मा का कहना है कि उन्होने बैडमिंटन के नेशनल स्तर काफी कुछ किया है, सरकार को उनकी दशा की जानकारी भले ही हो लेकिन चिंता नहीं है। हेमराज ने रोजी रोटी के लिए एक बैडमिंटन क्लब कोचिंग की। इस काम के लिए उन्हें 5 हज़ार रुपए महीना मिलते थे। लेकिन वो नौकरी भी जल्द ही चली गई।

अब परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें दिन भर रिक्शा चलाना पड़ता है। हेमराज कहते हैं कि उनकी कोचिंग के तहत सीखकर गए कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई लेकिन उनके लिए अभी तक कोई नौकरी या काम नहीं मिल पाया है।
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ईंट भट्टे पर काम करने की मजबूरी

दोहा एशियन गेम्स में देश के लिए रजत पदक लाने वाली एथलीट एस शांति ईंटे उठाने को मजबूर है। तमिलनाडु में एक ईंट भट्टे पर काम करने वाली शांति बताती है कि देश के लिए गौरव के पल लाने के बावजूद उसके अच्छे दिन कभी नहीं आए।

शांति कहती है कि 800 मीटर दौड़ के दौरान जैंडर टेस्ट में वो फेल हो गई और सरकार ने भी उसका पक्ष नहीं सुना। कई साल गरीबी और गफलत में गुजारने के बाद आखिरकार शांति को पटियाला में एथलीट कोच की ट्रेनिंग का अवसर मिला।

तमिलनाडु के चीफ मिनिस्टर एम करुणानिधि के कार्यकाल में शांति को डेढ लाख रुपए की मदद मिली थी जिससे परिवार ने खेती के लिए कुछ जमीन खरीद ली। लेकिन आंधी तूफान के चलते उसकी पूरी फल बरबाद हो गई और शांति एक बार फिर ईंट भट्टे पर काम करने को मजबूर हुई।
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