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चरवाहों ने फोड़ा था पाकिस्तानी हमले का भांडा

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5 अगस्त, 1965 को गुलमर्ग के पास मोहम्मद दीन अपनी भेड़ें चरा रहे थे। अचानक से उनके पास हरी सलवार-कमीज पहने दो अजनबी आए और 400 रुपए देकर पूछा कि क्या इस इलाके में भारतीय सेना की कोई चौकी है।
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उसी समय जम्मू के मेंढर इलाके में दो संदिग्ध दिखने वाले लोग एक शख़्स वजीर मोहम्मद से यही सवाल पूछा। दोनों ने ही अजनबियों से सहयोग करने का नाटक किया लेकिन इसकी जानकारी तुरंत भारतीय सेना को दे दी। ये लोग ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत भारत प्रशासित कश्मीर में घुसे थे। इस ऑपरेशन की योजना पाकिस्तान ने 1965 के शुरू में ही बना ली थी।

'फ्रॉम कच्छ टू ताशकंद' लिखने वाले फारूख़ बाजवा का कहना है कि ऑपरेशन के तहत हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को कश्मीरी छापामारों के वेश में भारतीय कश्मीर में घुसकर स्थानीय लोगों को भारत के ख़िलाफ विद्रोह के लिए भड़काना था। 1965 का युद्ध पाकिस्तान ने सेनाध्यक्ष जनरल मूसा के नेतृत्व में लड़ा था। पाकिस्तानी सेना की 12वीं डिवीजन के कमांडर मेजर जनरल अख़्तर हुसैन मलिक को इस ऑपरेशन की जिम्मेदारी दी गई थी।
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सादे कपड़ों में घुसपैठ

ऑपरेशन जिब्राल्टर अयूब ख़ाँ के दिमाग की उपज थी और उन्होंने ही जनरल मलिक को आदेश दिया था कि इस बारे में सेनाध्यक्ष जनरल मूसा को भी ज्यादा जानकारी नहीं दी जाए। ऑपरेशन जिब्राल्टर के सैनिकों को छह समूहों में बांटा गया था और उन्हें मुस्लिम योद्धाओं के 'कोड नेम' दिए गए थे। तारिक़, क़ासिम, ख़ालिद, सलाउद्दीन,गजनवी और बाबर। इनमें से बाबर सबसे छोटा समूह था जिसमें सिर्फ 34 लोग थे।

दूसरे समूहों में 34-34 सैनिकों की तीन प्लाटूनें थीं। इन सभी समूहों को 20 अतिरिक्त सैनिक और पाकिस्तान के एलीट स्पेशल सर्विसेज ग्रुप का एक-एक अफसर दिया गया था। इसके अलावा इनमें आजाद कश्मीर सैनिक, नॉर्दर्न स्काउट्स और स्थानीय अर्धसैनिक बल भी थे जिन्हें मुजाहिद के नाम से जाना जाता था। बाद में जनरल मूसा ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि कुल पांच से सात हजार लोगों ने कश्मीर में घुसपैठ की थी। इन सबको सैनिक वर्दी न पहनने का आदेश दिया गया था।

हर व्यक्ति के पास पांच दिनों के लिए पका हुआ खाना और पांच दिनों का ही कच्चा राशन था। हर सैनिक के पास एक लाइट मशीन गन थी। इस के अलावा हर सैनिक को चार हथगोले भी दिए गए थे। हर दस्ते के पास करीब 100 किलो विस्फोटक भी थे। हर कंपनी कमांडर को एक-एक वायरलेस सेट और हर कंपनी को चार-चार रेडियो ट्रांजिस्टर भी मिले थे जिन पर निश्चित फ्रीक्वेंसियों और निश्चित समय पर आदेश प्राप्त किए जा सकते थे। उनसे ये भी कहा गया था कि वो ख़ास समय पर कोडेड सिग्नल्स के लिए रेडियो आजाद कश्मीर सुनें।

रेडियो सदा-ए-कश्मीर

इन समूहों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान सिर्फ संदेशवाहकों के जरिए होना था। तारिक़ फोर्स को उत्तरी कश्मीर में भारतीय सेना के संचार माध्यमों को ध्वस्त करने की जिम्मेदारी दी गई थी जबकि क़ासिम फोर्स को पश्चिमी कश्मीर में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण पुलों को ध्वस्त करना था। सबसे बड़े फोर्स सलाउद्दीन में 6 कंपनियाँ थीं और उनको श्रीनगर को जाने वाली सुरंगों को बरबाद कर उसे शेष भारत से अलग-थलग करने का काम दिया गया था।

सबसे छोटी फोर्स बाबर को भारतीय सेना के 15 कोर के मुख्यालय ऊधमपुर पर धावा बोलने का आदेश मिला था। जिब्राल्टर बलों का काम आसान करने के लिए 350 लोगों की 14 और कंपनियाँ बनाई गई थीं जिन्हें नुसरत नाम दिया गया था। इनका काम सीमा पर मौजूद भारतीय बलों का ध्यान बँटाना था जिससे जिब्राल्टर सैनिकों को कश्मीर के अंदर घुसने का मौका मिल जाए।

5 अगस्त की रात में जम्मू के गलूटी क्षेत्र में भारतीय गश्ती दल पर करीब 70 जिब्राल्टर सैनिकों ने हमला किया। उसी दिन गुलमर्ग के पास पीरपंजाल पर जिब्राल्टर सैनिकों की भारतीय सैनिकों से दूसरी भिड़ंत हुई। 8 अगस्त को मुजफ्फराबाद के आजाद कश्मीर रेडियो ने ख़बर दी कि उसने भारतीय कश्मीर से चलाए जा रहे एक स्टेशन को मॉनिटर किया है जो ख़ुद को सदा-ए-कश्मीर (कश्मीर की आवाज) बताता है। उसने घोषणा की है कि कश्मीर में एक क्रांतिकारी परिषद बना दी गई है।

मार्शल लॉ से इनकार

भारत ने तुरंत ऐलान किया कि तथाकथित रेडियो सदा-ए-कश्मीर, भारत प्रशासित कश्मीर से नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अंदर से काम कर रहा है और 'इंटरनेशनल फ्रीक्वेंसी रजिस्ट्रेशन बोर्ड' में ये रेडियो फ्रीकवेंसियाँ पाकिस्तान को दी गई हैं। बाद में इस बात की पुष्टि भी हुई कि ये रेडियो स्टेशन वास्तव में भारतीय कश्मीर से नहीं, बल्कि रेसकोर्स ग्राउंड, रावलपिंडी से काम कर रहा था।

8 अगस्त को आकाशवाणी ने जिब्राल्टर फोर्स के चार अफसरों के इंटरव्यू प्रसारित किए जिन्हें पकड़ लिया गया था। उन्होंने पूरी योजना की विस्तृत जानकारी लोगों को दी। अल्ताफ गौहर अपनी किताब 'अयूब ख़ाँ- पाकिस्तान फर्स्ट मिलिट्री रूलर' में लिखते हैं कि जब उन्होंने ये बात पाकिस्तान की मिलिट्री इंटेलिजेंस के निदेशक ब्रिगेडियर इरशाद को बताई तो उनके मुंह से निकला, ‘ओ माय गॉड, द बास्टर्ड्स हैव स्पिल्ट द बींस।’ 24 घंटे के अंदर वो योजना जिसे, इसे अमल में लाने वालों से भी छुपाकर रखा गया था, दुश्मन के हाथों में थी।

तारिक़ फोर्स ने भारतीय कश्मीर में दो पुलों को उड़ाने की कोशिश की लेकिन उनका कोई ज्यादा असर नहीं पड़ा। 10 सितंबर आते-आते उनके इतने लोग हताहत हो गए कि उन्हें वापस सीमा पार लौटना पड़ा। ख़ालिद फोर्स को इस मायने में सफलता मिली कि उन्होंने 4 कुमाऊँ रेजीमेंट के बेस पर हमला किया जिसमें एक कमांडिंग ऑफिसर मारा गया और एक और अफसर घायल हुआ।

सीमा पार हवा नहीं लगी

सलाउद्दीन फोर्स श्रीनगर में घुसने में सफल हुई और उनकी उपस्थिति की वजह से ही पहली बार कश्मीर सरकार ने मार्शल लॉ लगाने की अनुमति मांगी जिसे भारत सरकार ने अस्वीकार कर दिया। श्रीनगर तक उनकी पहुंच ने जहाँ भारतीय सैनिकों को परेशान किया, वहीं ये भारत सरकार के लिए एक राजनीतिक उलझन भी बन गया। बटमालू को अपना गढ़ बनाते हुए उन्होंने सचिवालय और पुलिस लाइन पर छिटपुट फायरिंग की।

14-15 अगस्त की रात भारतीय सैनिकों ने इस इलाके की घर-घर तलाशी ली और पूरे इलाके में आग लगा दी। अगले दिन पूरे श्रीनगर शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। इस बीच रेडियो पाकिस्तान से ये लगातार प्रचार किया जाता रहा कि कश्मीर में हो रही हिंसा का कारण स्थानीय लोगों का विद्रोह है और पाकिस्तान का इससे कोई लेना देना नहीं है।

ऑपरेशन जिब्राल्टर की असफलता का मुख्य कारण था--समय और तैयारी की कमी। हालांकि भारतीय सेना के पश्चिमी कमान के प्रमुख जनरल हरबख़्श सिंह ने भी माना है कि कागज पर ये योजना जबर्दस्त थी लेकिन उसे लागू करने में कई ग़लतियाँ की गईं।
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ट्रेन्ड नहीं थे पाक सैनिक

इस अभियान में भेजे गए सैनिकों का मूल्यांकन करते हुए ब्रिटिश मिलिट्री रिव्यू ने लिखा कि ये सैनिक न तो शारीरिक रूप से फिट थे और न ही उन्हें अपने लक्ष्य की पूरी जानकारी दी गई थी। इनमें से कुछ तो सर्दी से मर गए और दूसरों ने लड़ने की इच्छाशक्ति खो दी। जिब्राल्टर के अधिकतर कमांडर कश्मीरी बोलना तक नहीं जानते थे।

उन्हें कश्मीर में चलने वाली वजन की मीट्रिक प्रणाली की भी जानकारी नही थी। जब भी वो भारतीय करेंसी से किसी दुकान पर कुछ खरीदने की कोशिश करते, तो तुरंत पहचान लिए जाते। कई कश्मीरी किसानों ने उन्हें भारतीय सैनिकों के हवाले किया। जनरल हरबख़्श सिंह भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री वाई बी चाव्हाण के साथ।

पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल मूसा ने अपनी आत्मकथा 'माय वर्जन' में लिखा, "इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी ख़ामी ये थी कि हमने सीमा पार के नेताओं (विद्रोही कश्मीरियों) को इस बारे में हवा भी नहीं लगने दी, उन्हें इस अभियान में शामिल करना तो बहुत दूर की बात थी।" लेकिन इन नाकामियों के बावजूद ये ऑपरेशन इस मामले में सफल रहा कि इसने बहुत बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों को उलझा लिया।
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