भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी और निष्ठा को देखते हुए प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, 'अत्यंत ईमानदार, दृढ़ संकल्प, शुद्ध आचरण और महान परिश्रमी, ऊंचे आदर्शों में पूरी आस्था रखने वाले निरंतर सजग व्यक्तित्व का ही नाम है लाल बहादुर शास्त्री। भारत की जनता के सच्चे प्रतिनिधि लाल बहादुर शास्त्री के संपूर्ण जीवनकाल का यदि सर्वेक्षण किया जाए तो निश्चय ही वे मानवता की कसौटी पर खरे कंचन सिद्ध होंगे।'
यूपी के मुगलसराय में एक बेहद गरीब परिवार में जन्मे लाल बहादुर शास्त्री ने देश की राजनीति में प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया। 17 साल की छोटी सी उम्र में ही गांधीजी की स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार करने की अपील पर वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। फलस्वरूप वे जेल भेज दिए गए। इसके बाद उन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम और नवभारत के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
लाल बहादुर शास्त्री की साफ छवि के कारण उन्हें 1964 में देश का दूसरा प्रधानमंत्री बनाया गया। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है। वह ऐसा करने में सफल भी रहे। उनका शासन काल बेहद कठिन रहा। पूंजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन-देश भारत पर आक्रमण करने की फिराक में थे।
पाकिस्तान ने 1965 में अचानक भारत पर हवाई हमला कर किया। राष्ट्रपति ने तुरंत आपात बैठक बुलाई, जिसमें तीनों सेनाओं के चीफ और मंत्रिमंडल के सदस्य शामिल थे। लालबहादुर शास्त्री कुछ देर से पहुंचे। तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने उनसे पूछा कि सर क्या हुक्म है? लाल बहादुर शास्त्री ने तुरंत कहा कि आप देश की रक्षा कीजिए और मुझे बताइए कि हमें क्या करना है?
लाल बहादुर शास्त्री के भाषणों से जनता का मनोबल बढ़ा और सब एकजुट हो गए। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी नहीं की थी। 1966 में उन्हें भारत का पहला मरणोपरांत भारत रत्न का पुरस्कार दिया गया जो इस बात को साबित करता है कि शास्त्री जी की सेवा अमूल्य है। शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है।