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राहुल के फैसलों से कांग्रेस में हाहाकार

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लोकसभा चुनावों के नतीजे जो भी हों लेकिन इन चुनावों के बाद कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर घमासान और भारी फेरबदल तय है।
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अगर नतीजे पार्टी के खिलाफ आए, जैसी कि पूर्वानुमान सभी एग्जिट पोल कर रहे हैं तो कई बड़े कांग्रेसी नेताओं के निशाने पर राहुल गांधी की टीम के वो नेता होंगे जिन्हें पिछले कुछ वर्षों से राहुल गांधी का रणनीतिकार, सलाहकार और वैचारिक प्रतिष्ठान माना जाता रहा है।

वहीं राहुल गांधी के करीबी एक नेता केमुताबिक अब राहुल बेहिचक पार्टी में ऊपर से नीचे तक फेरबदल करेंगे,जिनमें उनकी टीम के कुछ नेताओं के पर भी कतरे जा सकते हैं।
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एक मुख्यमंत्री ने कांग्रेस को क‌िया बेबस

कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि राहुल की कथित टीम की अनुभवहीनता, जमीनी राजनीति से दूरी और वरिष्ठों के प्रति दुराग्रह ने पार्टी की हालत यह कर दी कि दस साल तक देश में सरकार चलाने के बावजूद एक राज्य के विवादित मुख्यमंत्री ने उस कांग्रेस को बेबस कर दिया जिसने अब तक के संघ परिवार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता से हटाया था।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने गोपनीयता की शर्त पर कहा कि 2004 में जब भाजपा नेतृत्व की केंद्र में सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री थे।

सफलता के साथ चलाई थी दस साल सरकार

इसके अलावा लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, जसवंत सिंह, अरुण जेटली जैसे तमाम दिग्गज नेता और प्रमोद महाजन जैसे राजनीतिक प्रबंधक मुकाबले में थे, तब सोनिया गांधी की अगुआई में कांग्रेस ने न सिर्फ चुनावों में भाजपा को परास्त किया बल्कि उसके बाद यूपीए गठबंधन बनाकर पूरे पांच साल सफल सरकार चलाई और वामपंथियों की समर्थन वापसी के बावजूद न सिर्फ सरकार बचाई बल्कि 2009 के चुनावों में ज्यादा सफलता भी हासिल की।

इसके बाद परस्पर धुर विरोधी मायावती और मुलायम सिंह यादव को साध कर अगले पांच साल सरकार को कोई खतरा नहीं होने दिया। यहां तक कि तृणमूल कांग्रेस और डीएमके की समर्थन वापसी के बावजूद सरकार चलती रही। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव भी जीते।

राहुल के सलाहकारों ने क‌िया काम चौपट

इस वरिष्ठ नेता का कहना है कि 2009 चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी की जमीन तैयार हो गई थी। लेकिन राहुल गांधी के कथित सलाहकारों की सोशल इंजीनिय‌र‌िंग और अति पिछड़ावाद ने पहले विधानसभा चुनावों में सब चौपट कर दिया।

रही सही कसर लोकसभा चुनावों में पूरी कर दी। बिहार से जुड़े पार्टी के एक अन्य नेता के मुताबिक 2009 में लालू यादव और रामविलास पासवान के अलग होने केबाद कांग्रेस अकेले लोकसभा का चुनाव लड़ी।

भले ही सीटें महज दो आईं, लेकिन पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा और हर जिले में कार्यकर्ता खड़ा हो गया। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अनिल शर्मा की जमीनी मेहनत से बिहार में कांग्रेस नजर आने लगी और उम्मीद बनने लगी कि विधानसभा चुनाव में पार्टी 40 से 50 सीटें जीत सकती है।

लेकिन राहुल केकथित सलाहकारों ने जगदीश टाइटलर को प्रभारी बनवा कर प्रदेश इकाई में झगड़े बढ़ा दिए।

2009 में ब्राह्मणों और मुसलमानों ने ज‌िताया

चुनाव से तीन महीने पहले शर्मा और टाइटलर दोनों को हटा दिया गया और उन महबूब कैसर को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया जिन्हें अपने जिले की विधानसभा सीटों की भी सही जानकारी नहीं थी।

न सिर्फ कांग्रेस की दुर्गति बिहार में हुई बल्कि कैसर लोजपा में शामिल होकर एनडीए से लोकसभा का चुनाव भी लड़े हैं।

उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस के एक दिग्गज नेता के मुताबिक पिछले लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों मुसलमानों ने कांग्रेस की 22 सीटें जिताने में अहम भूमिका निभाई थी।

आकड़ों की बाजीगरी में लगी रही राहुल की कोर टीम

विधानसभा चुनावों में पार्टी में इस कदर पिछड़ावाद चला न सिर्फ सबसे कम टिकट ब्राह्मण और मुसलमानों को मिले बल्कि मुलायम सिंह की यादव पट्टी में कांग्रेस ने यादव उम्मीदवार उतारे जिनमें ज्यादातर की जमानतें जब्त हो गईं।

दूसरी पार्टियों से बुलाकर टिकट बांटने से समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ता घर बैठ गए। बल्कि कांग्रेस की ब्राह्मण राजनीति की धुरी रहे उत्तर प्रदेश का प्रभारी उन मधुसूदन मिस्त्री को बनाया गया जो गाजियाबाद और गाजीपुर का फर्क नहीं जानते थे।

कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता के मुताबिक दरअसल राहुल गांधी के कथित सलाहकारों ने राजनीतिक कार्यक्रमों की बजाय आंकड़े बाजी और विज्ञापन एजेंसियों पर ज्यादा भरोसा किया। जबकि नरेंद्र मोदी ने दोनों में संतुलन बनाए रखा।
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केजरीवाल को कांग्रेस ने कम आंका

राहुल की छापामार शैली ने उनकी छवि एक गंभीर राजनेता की बजाय एक अति उत्साही युवा नेता की बनाई। कलावती से लेकर भट्ठा पारसौल तक उन्होंने जितने भी अभियान किए, पार्टी उन्हें राजनीतिक कार्यक्रमों में नहीं बदल सकी।

राहुल का बार बार प्रधानमंत्री या मंत्री बनने से इनकार का भी नुकसान हुआ। अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को कम करके आंका गया और उससे निबटने की कोई रणनीति बनी ही नहीं।

दिसंबर के विधानसभा चुनावों की हार से भी कांग्रेस नहीं चेती।
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