मानसून की बेरुखी पर महंगी सिंचाई के कारण छोटे किसानों को अब शायद खेती से किनारा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वैज्ञानिकों ने सिंचाई की सस्ती तकनीक खोज निकाली है। इसके जरिए न सिर्फ सीमित पानी से फसलों की पर्याप्त सिंचाई हो सकेगी बल्कि इस तकनीक को कोई भी किसान आसानी से स्वयं ही कारगर कर सकेगा।
इस तकनीक के लिए बस ग्लूकोज की बेकार, खाली बोतलों की जरूरत होती है। जो बाजार में आसानी से 20 से 25 रुपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध हैं। खास बात यह है कि ड्रिप सिंचाई की इस तकनीक से पानी की भी बचत होती है और कम पैसे में सिंचाई की इस तकनीक से फसल की लागत भी नहीं बढ़ती। इससे किसानों को खासा लाभ होता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी परियोजना (एनएआईपी) के वैज्ञानिकों ने ग्लूकोज की बेकार बोतलों के जरिए ड्रिप सिंचाई की सस्ती तकनीक खोज निकाली है। इस तकनीक के तहत बेकार बोतलों के ऊपरी सिरे को थोड़ा काट दिया जाता है ताकि उसमें पानी भरा जा सके।
इन बोतलों को खेत की प्रत्येक नालियों के छोर पर किसी छड़ी या तीन फुट के बांस पर कील लगाकर वैसे ही लटकाया जाता है जैसे ग्लूकोज चढ़ाते समय इसे स्टैंड पर लगाया जाता है। दूसरे सिरे पर लगे पाइप से पानी बूंदों के जरिए नीचे गिरता रहता है। पानी की रफ्तार तेज व धीमे भी की जा सकती है क्योंकि ग्लूकोज में लगे पाइप में यह नियंत्रक पहले से ही लगा होता है।
एनएआईपी के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. पीएस पाण्डेय ने बताया कि बागवानी की खेती में ड्रिप सिंचाई का ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसीलिए प्रयोग और प्रशिक्षण के तौर इस तकनीक का इस्तेमाल मध्य प्रदेश के उन आदिवासी क्षेत्रों में किया गया, जहां पानी की कमी है और ज्यादातर खेतिहर भूमि ऊबड़-खाबड़ है। यहां के ज्यादातर किसान सब्जी की खेती करते हैं।
वैज्ञानिकों ने एक एकड़ भूमि में छह किलो ( लगभग 350 ) बेकार ग्लूकोज की बोतलों का इस्तेमाल किया। सिंचाई की इस अभिनव तकनीक से लागत में भारी कमी आई वहीं फसलों की उत्पादकता भी बढ़ी। वैज्ञानिकों का दावा है कि सिंचाई की इस तकनीक से सब्जी उगाने वाले किसान एक मौसम में प्रति एकड़ डेढ़ से पौने दो लाख रुपये तक कमा सकते हैं।