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निर्भया के मां-बाप की याचिका पर SC का सरकार को नोटिस

Mon, 02 Dec 2013 03:39 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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दिल्ली गैंगरेप मामले में निर्भया के माता-पिता को उम्मीद की नई किरण दिखाई है। इस घटना में सबसे क्रूर बताए गए नाबालिग को लेकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दाखिल की थी, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस भेजा है।
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इस बीच सरकार ने गंभीर अपराध को अंजाम देने वाले 16 साल से ज्यादा के आरोपियो को बालिग मानने वाले नियम बनाने की ओर कदम बढ़ा दिया है।

इस याचिका में नाबालिग दोषी को भी बालिग दोषियों के बराबर सजा देने की अपील की गई। दिल्ली गैंगरेप मामले में चार दोषियों को अदालत ने सजा-ए-मौत सुनाई थी। एक दोषी ने जेल में आत्महत्या कर ली थी।

नाबालिग को हुई तीन साल कैद
छठा दोषी नाबालिग था, इसलिस उसे अधिकतम सजा तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया गया। परिजनों का कहना है कि इस आरोपी को जुवेनाइल की श्रेणी में रखने वाले कानून को रद्द किया जाए और आपराधिक अदालत में आरोपी के खिलाफ ट्रायल चलाया जाए।
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जिस समय यह घटना हुई थी उस समय उसकी उम्र 18 साल से मात्र छह महीने कम थी। उसे 23 साल की लड़की की हत्या और गैंगरेप के मामले में दोषी करार दिया गया है और जुवेनाइल कानून के तहत तीन साल का कारावास की सजा मिली है।

पीड़िता के परिजनों ने सर्वोच्च अदालत से कहा है कि 31 अगस्त को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की ओर से जारी किया गया फैसला उन्हें स्वीकार नहीं है।

उनकी याचिका में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। चूंकि इस मामले में किसी अन्य प्राधिकरण से उन्हें राहत उम्मीद नहीं है इसलिए सीधे तौर पर शीर्षस्थ अदालत में याचिका दायर की गई है।

पीड़िता के पिता बद्रीनाथ सिंह और मां आशा देवी ने याचिका में सर्वोच्च अदालत से जुवेनाइल जस्टिस एक्ट को असंवैधानिक और अवैध करार दिए जाने का निर्देश जारी करने का आग्रह किया है।

सरकार ने भी उठाया कदम
सरकार ने भी प्रस्ताव किया है कि गंभीर अपराध से जुड़े मामलों में 16 साल से ज्यादा के आरोपियों को बालिग माना जाए। इस प्रस्ताव से जुड़े कैबिनेट नोट को अंतिम रूप दे दिया गया है।

अगर ऐसा होता है कि 16 से 18 साल के नाबालिगों पर भी भारतीय दंडि संहिता की धारा लगेगी और उन्हें बालिग माना जाए। ऐसे में उनके खिलाफ मुकदमा जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत दर्ज नहीं होगा।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के इस प्रस्ताव के मुताबिक अपराध पर आईपीसी की धाराओं के तहत कार्रवाई की जाए या फिर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के जरिए, इस पर फैसला सबूत खंगालने, अपराध की गंभीरता और आरोपी के पिछले व्यवहार एवं सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक स्थिति के आधार पर किया जाएगा।
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