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राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई पर राज्यों को नोटिस

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राजीव गांधी हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को उम्रकैद की सजा भुगत रहे उन कैदियों को रियायत देकर रिहा करने से रोक दिया, जिनके मामलों सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसी ने केंद्रीय कानूनों के तहत जांच की हो।
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सर्वोच्च अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को रिहा करने का निर्णय लेने की वजह से तमिलनाडु और केंद्र सरकार के बीच उपजे इस विवाद में सभी राज्यों से जवाब तलब किया है।

चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने दोषियों को रियायत देकर छोड़े जाने के मुद्दे पर राज्यों और केंद्र सरकार के अधिकार के दायरों को लेकर 18 जुलाई तक सभी राज्यों से जवाब तलब किया।
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'इस विवाद को एक ही बार में निपटाएं अदालतें'

पीठ ने सॉलिसीटर जनरल रंजीत कुमार की दलील को स्वीकार किया, जिसमें यह सवाल उठाया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री हत्याकांड मामले की वजह से ऐसे अन्य मामले भी सामने आ जाएंगे। इसलिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से विस्तृत जवाब तलब किए जाने की जरूरत है।

पीठ ने कहा कि न्यायपालिका के समक्ष यह ऐसा मामला है, जिसमें कोई मिसाल नहीं है। अदालत को इस कानूनी विवाद को एक ही बार में निपटाने की उपलब्धि हासिल करनी चाहिए। ताकि कानून के सिद्धांतों में इस मसले को लेकर कोई भी भ्रम शेष नहीं रह जाए।

संविधान पीठ ने कहा कि इस दौरान कोई भी राज्य सरकार अपराध प्रक्रिया संहिता के तहत उन मामलों में दोषियों को रिहा करने में रियायत के अधिकार (रेमीशन) का प्रयोग नहीं करेगी, जिनमें दोषियों के लिए उम्रकैद की सजा मुकर्रर है और सीबीआई या अन्य किसी केंद्रीय एजेंसी की ओर से केंद्रीय सूची के कानूनों के तहत जांच की गई है।

अदालत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर 18 जुलाई तक जवाब तलब कर रही है। पीठ ने कहा कि इस मामले में अदालत अगली सुनवाई 22 जुलाई को करेगी।

जयललिता की कैबिनेट के निर्णय को दी गई चुनौती

याद रहे कि केंद्र या तमिलनाडु सरकार को राजीव हत्या मामले में सातों दोषियों को रियायत देकर रिहा करने का अधिकार प्राप्त है या नहीं, इस सवाल को अप्रैल में तीन सदस्यीय पीठ ने बड़ी पीठ को भेजे जाने का निर्णय लिया था।

गौरतलब है कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की ओर से मुख्यमंत्री जे जयललिता की कैबिनेट के उस निर्णय को चुनौती दी गई है, जिसमें दोषियों को रियायत देकर कैद से रिहा करने को कहा गया था।

इस तरह का मुद्दा पहली बार अदालत के समक्ष उठा है, जिसमें केंद्र और राज्य, दोनों के कार्यकारियों की ओर से कैदियों को रियायत देने के अधिकार के दायरे पर विचार किया जा रहा है।
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संविधान पीठ के समक्ष हैं सात महत्वपूर्ण सवाल

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने संविधान पीठ को सात अहम सवाल भेजे हैं। पहला सवाल है कि क्या एक बार संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति द्वारा या अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल द्वारा या अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा माफी देने के अधिकार का इस्तेमाल किये जाने के बाद कार्यपालिका फिर से इस पर विचार कर सकती है।

दूसरा कि क्या किसी कैदी की सजा, जिसे मृत्युदंड से उम्रकैद में तब्दील किया जा चुका है, सरकार माफ कर सकती है। संविधान पीठ यह भी निर्णय करेगी कि क्या उम्रकैद का मतलब संपूर्ण जिंदगी की कैद है या उम्रकैद की सजा भुगत रहे कैदी को माफी का दावा करने का अधिकार है और क्या कोई ऐसी विशेष श्रेणी बनायी जा सकती है जिसमें मृत्युदंड को उम्रकैद की सजा में तब्दील करने या 14 साल से अधिक की कैद हो और इस श्रेणी को माफी के दायरे से परे रखा जा सके।

क्या माफी के अधिकार के लिये संविधान की 7वीं अनुसूची की समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर केंद्र और राज्य को वरीयता प्राप्त है।
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