सर्वोच्च अदालत ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की वैधानिकता को चुनौती देने वाली किसान संगठनों की याचिका पर केंद्र सरकार समेत अन्य को नोटिस जारी किया है।
हालांकि न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ और न्यायमूर्ति एसए बोबडे की पीठ ने अध्यादेश पर यह कहते हुए रोक लगाने से इनकार कर दिया कि पहले वह सरकार का पक्ष जानना चाहेगी।
पीठ ने किसान संगठनों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह से कहा कि पहले हम देखेंगे कि सरकार क्या जवाब देती है। अगर हमें जरूरी लगा तो हम रिकॉर्ड भी तलब कर सकते हैं।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर अध्यादेश कानून की शक्ल ले लेता है तो याचिका का कोई मतलब नहीं रह जाएगा क्योंकि याचिका में जिस तरीके से अध्यादेश को जारी और पुन: जारी किया गया है, उसे चुनौती दी गई है।
अध्यादेश पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार
अदालत ने विधि एवं न्याय मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय, गृह मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय और कैबिनेट सचिवालय को नोटिस जारी करते हुए चार हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। इंदिरा जयसिंह ने सुनवाई जल्द करने की गुहार की लेकिन पीठ ने इनकार कर दिया।
याचिका दिल्ली ग्रामीण समाज, भारतीय किसान यूनियन, ग्राम सेवा समिति और चोगामा विकास आवाम कल्याण समिति द्वारा दाखिल गई है। याचिका में गत तीन अप्रैल को केंद्र सरकार की ओर से जारी किए गए भूमि अधिग्रहण संशोधित अध्यादेश को निरस्त करने की गुहार लगाई गई है।
याचिका में कहा गया है कि महज इसलिए कि सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, उसे अध्यादेश के जरिये कानून को जारी रखने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। याचिका में कहा गया कि अध्यादेश के जरिये नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
संविधान के अनुच्छेद 123(2)(ए) के तहत अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों से पास कराना जरूरी है।
संसद सत्र शुरू होने के छह हफ्ते के अंदर पारित न होने पर यह अध्यादेश खत्म हो जाता है। सरकार इस प्रावधान का बेजा इस्तेमाल कर रही है। इस मामले में 5 अप्रैल को यह अवधि खत्म होनी थी लेकिन सरकार ने तीन अप्रैल को दोबारा अध्यादेश जारी कर दिया।