सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद्द होने के बाद पहले दौर की नीलामी में विफल रहने या नीलामी में शामिल न होने वाली टेलीकॉम कंपनियों को अपना कारोबार जारी रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जस्टिस जीएस सिंघवी और जस्टिस केएस राधाकृष्णन की पीठ ने साथ ही सरकार से इस मसले पर स्पष्ट रुख अपनाने को कहा है।
पीठ ने कहा कि गत वर्ष 2 फरवरी के निर्णय के बाद कारोबार जारी रखने वाली संचार कंपनियों को नई नीलामी के लिए निर्धारित सुरक्षित मूल्य के आधार पर भुगतान करना होगा। शीर्षस्थ अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में 2जी स्पेक्ट्रम की नई नीलामी प्रक्रिया होने तक उन दूरसंचार कंपनियों को अपना कारोबार जारी रखने की अनुमति दी थी जिनके लाइसेंस पिछले साल फरवरी में रद्द कर दिए गए थे।
कोर्ट ने कहा कि संचार विभाग को इस मसले पर अपना नजरिया साफ करना होगा। गत वर्ष 12 और 13 नवंबर की नीलामी में असफल रहने वाली कंपनियों को कारोबार की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि वहां अब सफल बोली लगाने वाली दूसरी कंपनियां उपलब्ध हैं।
नीलामी प्रक्रिया में शामिल नहीं होने वाले भी कारोबार जारी रखने के हकदार नहीं हैं। अगर इन्हें अनुमति दी गई तो मुकदमे और बढ़ेंगे। स्पेक्ट्रम के उन सभी लाइसेंसों के लिए नीलामी होगी जिनके संबंध में 10 जनवरी, 2008 को आशय पत्र जारी किए गए थे और जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के 2 फरवरी, 2012 के निर्णय के तहत रद्द कर दिया गया था। रद्द किए गए लाइसेंसों से आई रिक्तता को नई नीलामी से भरना होगा।
सुप्रीम कोर्ट कहा कि संचार कंपनियां उसके आदेश की अलग-अलग व्याख्या कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत सिर्फ 1800 और 800 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम बैंड की नीलामी को ध्यान में रखकर आदेश दे रही है। 900 मेगाहर्ट्ज की नीलामी से उसका कोई सरोकार नहीं है। पीठ ने कहा कि कुछ लोग नीलामी प्रक्रिया को निष्फल करने का प्रयास कर रहे हैं। पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार से कहा था कि पिछले साल लाइसेंस रद्द होने के बावजूद कारोबार जारी रखने वाली कंपनियों से लिए जाने वाले शुल्क की कीमत स्पष्ट की जाए।
क्या था मामला
सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 2 फरवरी को 2जी स्पेक्ट्रम के 122 लाइसेंस रद्द करते हुए दूरसंचार विभाग को इनके लिए चार महीने के भीतर नए सिरे से नीलामी करने का निर्देश दिया था। यह अवधि बाद में अंतरिम आदेश के जरिये कई बार बढ़ाई गई थी।