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'प्रजातंत्र की हत्या हो और हम चुप रहे, ऐसा नहीं हो सकता'

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस दलील पर पर घोर आपत्ति जताई कि राज्यपाल के द्वारा लिए गए सभी निर्णयों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं लाया जा सकता। शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा कि अगर प्रजातांत्रिक प्रक्रिया की हत्या हो रही हो तो अदालत मूकदर्शक नहीं बन सकती। शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी अरुणाचल प्रदेश में राजनीतिक संकट से जुड़े मसले पर सुनवाई के दौरान की।
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न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह टिप्पणी भाजपा सांसद की ओर से पेश वकील द्वारा यह कहने पर दी कि राज्यपाल द्वारा लिए गए सभी निर्णयों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं लाया जा सकता।

वहीं पीठ ने अक्टूबर से लेकर अब तक अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के तमाम रिकार्ड को आठ फरवरी तक पेश करने केलिए कहा है। संविधान पीठ विधानसभा के अधिकारियों द्वारा पेश किए दस्तावेजों से संतुष्ट नहीं थी।
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इन मसलों पर क्या संवाद हुए थे?

पीठ वास्तव में यह पता लगाना चाहती है कि अरुणाचल विधानसभा के अध्यक्ष नबाम रेबिया और राज्यपाल जेपी राजखोवा के बीच विधानसभा सत्र को समय से पूर्व बुलाने और कांग्रेस के बागी विधायकों की अयोग्यता जैसे मसले पर क्या संवाद हुए थे।

कांग्रेस के कुछ बागी विधायकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने राज्यपाल के निर्णय को सही बताते हुए कहा कि सत्र बुलाने को अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता और इसमें प्रजातंत्रिक व्यवस्था को चोट पहुंचाने जैसी कोई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि अप्रजातांत्रिक काम तो विधानसभा को बंद करना है।

उन्होंने कहा कि कुछ संविधान प्रावधान हैं जो राज्यपाल को विशेष परिस्थितियों में अपने विवेक पर निर्णय लेने का अधिकार देता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि विधानसभा सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल के लिए मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल से सलाह लेना जरूरी नहीं है। सुनवाई शुक्रवार को भी जारी रहेगी।
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