सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और रुड़की स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के निदेशकों से यमुना नदी की सफाई के लिए परियोजना तैयार करने को कहा है। बीस साल में 12 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद यमुना की स्थिति ज्यों की त्यों रहने पर शीर्ष कोर्ट ने नदी के प्रदूषण को दूर करने के लिए नए सिरे से परियोजना पर काम करने का निर्देश दिया।
जस्टिस स्वतंत्र कुमार और जस्टिस मदन लोकुर की पीठ ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सचिव को आईआईटी निदेशकों के साथ सभी संबंधित अफसरों की बैठक बुलाने को कहा है ताकि नई परियोजना का प्रारूप तैयार किया जा सके। पीठ ने दोनों संस्थानों के निदेशकों से कहा कि हम चाहते हैं कि आप एक विस्तृत परियोजना तैयार करे। नदी साफ करने की परियोजना की रूपरेखा तैयार करें। अदालत का मानना है कि कठोर कदम उठाए बगैर यमुना को साफ करना असंभव है।
पीठ ने कहा कि दिल्ली विकास प्राधिकरण, दिल्ली नगर निगम, दिल्ली जल बोर्ड, उपराज्यपाल के प्रतिनिधि, हरियाणा के मुख्य सचिव और यमुना सफाई के मामले में अदालत की मदद के लिए नियुक्त वकील बैठक में शामिल हों। यह बैठक 12 जनवरी को होगी और परियोजना की रूपरेखा आठ फरवरी से पहले कोर्ट में पेश की जाएगी। पीठ ने कहा कि 1994 के बाद से यमुना नदी की स्थिति बदतर हुई है। अदालत ने निदेशकों से कहा कि परियोजना का प्रारूप तैयार होने के बाद उत्कृष्ट लोगों की मदद से काम को अंजाम दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का मत है कि दिल्ली के तमाम सरकारी महकमों में तालमेल की कमी के कारण यमुना के जल को प्रदूषण से बचाना असंभव है। सुनवाई की पिछली तारीख पर अदालत ने कहा था कि यमुना नदी में नालों का गंदा पानी और कचरा लगातार जा रहा है।
अगर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) दिल्ली से लगभग 40-50 किमी दूर बनाए जाएं तो हो सकता है कि गंदे पानी को साफ करके नदी में प्रवाहित किया जा सके। इसी संभावना के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने देश के दो प्रमुख आईआईटी के निदेशकों को 11 दिसंबर को अदालत में बुलाया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दोनों निदेशक मंगलवार को अदालत में मौजूद थे। गौरतलब है कि एक समाचार पत्र में 1994 में यमुना नदी की स्थिति के बारे में प्रकाशित खबर का सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया था। इसके बाद से अदालत ने समय समय पर इसकी सफाई के लिए अनेक निर्देश भी दिये थे लेकिन स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ।