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संघ ने लगाया मोदी के 'रिश्तों की रफ्तार' पर ब्रेक

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अमेरिका को भारत में रणनीतिक साझेदारी की अपार संभावना दिख रही है। खासकर, ग्रीन ऊर्जा के क्षेत्र में। जलवायु परिवर्तन का खतरा कम करने के लिए लगातार बढ़ते दबाव के बीच भारत में ग्रीन ऊर्जा की व्यापक संभावना है।
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भारत की करीब 80 करोड़ जनता सालाना प्रति व्यक्ति 200 यूनिट से कम बिजली का उपभोग करती है, जबकि विकसित देशों में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 7000 यूनिट है। देश में करीब 40 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन तक अब भी बिजली नहीं पहुंची है।

ऐसे में अमेरिका को लगता है कि वह इस क्षेत्र में भारत के साथ बड़ा द्विपक्षीय सौदा कर सकता है, जो एक लंबी और टिकाऊ साझेदारी साबित होगी।

इसके साथ ही अमेरिका के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे शख्स हैं, जो दोनों देशों को फायदा पहुंचाने वाले समझौते के इच्छुक हैं। बीते सालों में उन्होंने कुछ ऐसा ही गुजरात में किया है। ऐसे में अमेरिका, मोदी सरकार के साथ इन क्षेत्रों में आगे बढ़ना चाहेगा।
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किस कानून पर रोक लगाने की वकालत करते हैं पश्चिमी देश?

यूपीए-1 के कार्यकाल में हुए परमाणु समझौते के बाद संवेदनशील तकनीक साझा करने के तमाम वादों के बावजूद आज भारत-अमेरिका संबंधों में एक तरह से ठहराव है।

रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए उचित शर्तों के साथ संवेदनशील तकनीक साझा करने का मसला निश्चित तौर पर बेहद अहम है। अमेरिकी नई और संवेदनशील तकनीक साझा करने के इच्छुक हो सकते हैं, लेकिन तभी, जब उनकी ‘चिंताओं’को दूर कर दिया जाए।

संवेदनशील तकनीक साझा करने का यह मसला उन तमाम मसलों का ही हिस्सा है, जिसमें भारत को अपने हित से कुछ बड़े समझौते करने पड़ेंगे। इनमें से कुछ समझौते निश्चित तौर पर मोदी के लिए राजनीतिक आर्थिक जोखिम पैदा करने वाले हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका चाहता है कि दवा क्षेत्र को संचालित करने वाले भारत के पेटेंट कानून की समीक्षा हो।

यह कानून महामारी की स्थिति में गरीब लोगों के लिए किसी भी दवा की सस्ती किस्म के उत्पादन का अनिवार्य लाइसेंस देता है। इस कानून को विकासशील देशों में काफी सराहा गया है। लेकिन, पश्चिमी दवा कंपनियां इस पर प्रतिबंध की मांग कर रही हैं। यह एक जटिल मुद्दा है और सबसे पहले संघ परिवार से जुड़े तत्व ही ऐसे किसी भी कदम का विरोध करेंगे।

मोदी मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई के खिलाफ नहीं

वैश्विक दवा कंपनियां हमारे पेटेंट कानून के उस प्रावधान को भी नापसंद करती हैं, जिसके तहत उन्हें किसी दवा के मूल्य में मनचाही वृद्धि की अनुमति नहीं है और न ही उसका पेटेंट करवा सकती हैं।

ये ऐसे मुद्दे हैं, जिस पर दोनों देशों के बीच सौदे की गाड़ी पटरी से उतर सकती है। जहां तक परमाणु उत्तरदायित्व कानून का मसला है तो आशा जताई जा रही है कि भारत सरकार कानून में बदलाव किए बिना कोई रास्ता निकाल ले। इसमें सरकार की तरफ से अमेरिकी आपूर्तिकर्ता को लिखित में गारंटी दी जा सकती है, जिससे कि आपूर्तिकर्ता का दायित्व कम हो जाए।

दोनों देशों के बीच नए द्विपक्षीय निवेश समझौते की संभावित घोषणा की भी चर्चा है। लेकिन, किसी भी द्विपक्षीय निवेश समझौते पर चर्चा के दौरान दोनों देशों के बीच बौद्धिक संपदा अधिकार पर विवाद का उठना तय है। यह भी तय है कि भारत मल्टी ब्रांड रिटेल, बीमा और बैंकिंग क्षेत्र को एफडीआई के लिए खोलने को तैयार हो जाए।

हाल में पीएम मोदी से मिलने वाले प्रोफेसर जगदीश भगवती ने हमें बताया कि सैद्धांतिक रूप से पीएम मोदी मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र में एफडीआई के बिल्कुल खिलाफ नहीं हैं। अगले कुछ सालों में इस क्षेत्र को खोला जा सकता है। लेकिन, तब भाजपा को यह स्पष्ट करना होगा कि जब मनमोहन सरकार ने इसकी अनुमति दी थी तो उसने क्यों राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ रखा था।
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संघ परिवार किन कदमों के हैं खिलाफ

अमेरिकी कंपनियां भारत में निर्माण क्षेत्र से अधिक सेवा क्षेत्र में प्रवेश की इच्छुक हैं। निर्माण के क्षेत्र में वे रक्षा और ग्रीन एनर्जी यानी सौर और परमाणु ऊर्जा तक ही सीमित रहना चाहती हैं। लेकिन, संघ परिवार बीमा और बैंकिंग सेक्टर को पूरी तरह से खोलने के किसी भी कदम के खिलाफ है।

सैद्धांतिक रूप से संघ का मानना है कि भारतीय लोगों की बचत का इस्तेमाल केवल भारती कंपनियां करें। हालांकि, ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि इन मसलों पर मोदी की संघ नेतृत्व के साथ परदे के पीछे कोई बातचीत हुई है। ये कुछ ऐसे राजनीतिक आर्थिक मसले हैं जिनका समाधान ढूंढे बिना द्विपक्षीय निवेश समझौते पर आगे नहीं बढ़ सकता है।

भारत के हिसाब से देश में ही संयुक्त रक्षा उत्पाद इकाइयां लगाना सबसे कम विवादित मसला है। संघ परिवार भारत अमेरिका रक्षा समझौते का समर्थन कर सकता है, लेकिन यह एक पूरा पैकेज समझौता होगा। ऐसा नहीं होगा कि भारत इसमें से अपने हिसाब से कुछ का चुनाव कर ले और अन्य को छोड़ दे। यही भारत-अमेरिका संबंध में नए अध्याय लिखने की सबसे बड़ी चुनौती है।
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