केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार गठित होने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मोदी को निरकुंश नहीं होने देगा और सत्ता की चाबी संघ पूरी तरह अपने हाथ में रखेगा।
संघ इन चुनावों के बाद वृहद हिंदू एकीकरण के अपने मूल एजेंडे पर भी अमल करेगा। इसके लिए संघ के कुछ बड़े नेता उत्तर प्रदेश और बिहार समेत देश के तमाम राज्यों के उन क्षेत्रीय दलों के नेताओं के संपर्क में भी हैं, जिन्हें आम तौर पर भाजपा का धुर विरोधी माना जाता है।
इन छत्रप नेताओं को भरोसा दिया जा रहा है कि केंद्र में भाजपा नेतृत्व की सरकार बनने पर उनके राजनीतिक और दूसरे हितों की क्षति नहीं होने दी जाएगी।
चुनाव बाद मोदी को नियंत्रण में रखेगा संघ
यह जानकारी देने वाले संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि संघ नेतृत्व के लिए लिए मोदी सिर्फ साधन हैं, साध्य नहीं।
सर संघ चालक मोहन राव भागवत और उनकी सलाहकार मंडली चाहती है कि मोदी का इस्तेमाल कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में तो किया जाए, उसके बाद मोदी वही करें जो संघ चाहता है।
नेतृत्व ने संघ परिवार के उन सभी मोदी विरोधियों को यह कहकर शांत कर दिया है कि चुनाव के बाद मोदी को संघ की बात माननी होगी। इनमें विहिप के मुखर नेता प्रवीण तोगडिय़ा,भाजपा में धुर मोदी विरोधी माने जाने वाले संजय जोशी जैसे कई लोग शामिल हैं।
संघ को नहीं पसंद मोदी का कार्पोरेट एजेंडा
हाल ही में गुजरात में केशूभाई पटेल की पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी का भाजपा में विलय और लगातार पिछले दस साल से मोदी विरोध का झंडा बुलंद किए पूर्व गृह राज्य मंत्री गोरधन झड़फिया को इसी भरोसे के साथ संघ की पहल पर ही भाजपा में वापस लिया गया है।
संघ सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मोदी के कार्पोरेट एजेंडा और अतिशय व्यक्तिवाद गुरेज है। गुजरात में संघ की प्रदेश इकाई, किसान संघ और विहिप जैसे अनुषांगिक संगठनों और भाजपा व संघ परिवार के पुराने संघ निष्ठ नेताओं के साथ हुए बर्ताव से संघ नेतृत्व पहले से ही असहज रहा है।
लेकिन विकल्पहीनता में उसे नरेंद्र मोदी की हर जिद माननी पड़ी और संजय जोशी जैसे अपने लाड़लों को कुर्बान भी करना पड़ा। लेकिन चुनाव के बाद संघ राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को मनमानी करने की छूट नहीं देगा।
संघ की रणनीति का अंजाम दे रहे राजनाथ
संघ के एक पदाधिकारी के मुताबिक भाजपा पर दशकों से काबिज आडवाणी और उनके गुट का कांटा निकालने के लिए संघ ने मोदी के कांटे का इस्तेमाल बखूबी किया। लेकिन वह मोदी को कांटा नहीं बनने देगा।
संघ नेतृत्व की कोशिश है कि लोकसभा चुनावों के बाद एनडीए और भाजपा का स्वरूप कुछ ऐसा हो जिससे कि मोदी निरंकुश न हो सकें। रामविलास पासवान और उदित राज जैसे कभी धुर मोदी विरोधी रहे नेताओं को एनडीए और भाजपा में संघ की पहल पर लाया गया।
इन नेताओं का ह्रदय परिवर्तन भाजपा ने नहीं संघ नेताओं ने किया, जिसे संघ के निर्देश पर राजनाथ सिंह ने अंजाम दिया।
मोदी विरोधी नेताओं को साधने में जुटा संघ
यह जानकारी देने वाले संघ के एक प्रचारक जो संघ प्रमुख के बेहद करीब भी हैं, के मुताबिक कुछ और भी ऐसे नेता संघ के संपर्क में हैं जिनकी राजनीति प्रकट रूप में धुर मोदी विरोधी मानी जाती है, लेकिन संघ के साथ उनका संवाद निरंतर बना हुआ है। इनमें कुछ नाम चौंकाने वाले हैं।
संघ के रणनीतिकारों के मुताबिक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने सवर्ण और गैर यादव पिछड़ा जनाधार बनाकर संघ के हिंदू एकीकरण की प्रक्रिया को खासी गति दी थी। लेकिन उत्तर प्रदेश में वाजपेयी और कल्याण सिंह के झगड़े ने इसे तोड़ दिया।
गुजरात में भी शंकर सिंह वाघेला और केशूभाई पटेल और कर्नाटक में बीएस येदुयेरप्पा जैसे संघनिष्ठ नेताओं को भाजपा से बाहर जाना पड़ा।
अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना संघ का लक्ष्य
संघ का मानना है कि राजनाथ सिंह को भाजपा अध्यक्ष बनाकर, कल्याण सिंह, उमा भारती, केशूभाई पटेल, वीएस येदुयेरप्पा, गोरधन झड़फिया आदि को लाकर संघ अपने एजेंडे को आगे बढ़ा सकेगा।
इसके अलावा संघ की कोशिश है कि हिंदू समाज का बड़ा हिस्सा जिसमें यादव, जाट, गूजर जैसी पिछड़ी किसान जातियां शामिल हैं और दलित जो उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ एकजुट हैं, को बिना अपने साथ जोड़े वृहद हिंदू एकता मुमकिन नहीं है।
पासवान को एनडीए में लाकर और उदित राज को भाजपा में शामिल कराकर संघ ने दलितों को जोडऩे की कोशिश की है। अब संघ के संपर्क सूत्र यादवों और दलितों में अच्छी पैठ रखने वाले नेताओं के साथ निरंतर संवाद कर रहे हैं।
2014 के बाद के चुनावों पर संघ की नजर
इन नेताओं की भाजपा विरोधी राजनीति मुस्लिम वोटों के बंटवारे के लिए संघ के मुफीद है, लेकिन चुनाव के बाद जरूरत पडऩे पर यह नेता केंद्र में भाजपा सरकार बनवाने में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से मदद करें और बदले में संघ की तरफ से यह आश्वासन भी है कि इन नेताओं के राजनीतिक हितों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।
संघ के रणनीतिकारों का मानना है कि इससे संघ के दायरे से बाहर इन नेताओं के जनाधार वर्ग में सकारात्मक संदेश जाएगा और इनके कमजोर होने पर यह जनाधार कांग्रेस की तरफ न जाकर भाजपा की तरफ आएगा।
यह प्रक्रिया पूरी होने पर संघ अगले चुनावों तक भाजपा को अकेले बहुमत की सरकार बनाने लायक कर देगा।