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संघ और विहिप का हमला, गोमांस खाने वाले हैं जानवर

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दादरी की घटना से शुरू हुआ गोमांस विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। भाजपा नेताओं के सुर धीमे पड़ने के बाद संघ परिवार अब इस मुद्दे को लेकर हमलावर हो गया है।
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संघ के मुखपत्र पांचजन्य ने अपने विशेष संपादकीय में बीफ विवाद को सेकुलर राजनीति और वामपंथी बुद्धिजीविता से जोड़ते हुए साहित्यकारों के हो रहे इस्तीफों पर सवाल उठाया है।

तो विश्व हिंदू परिषद के मुखपत्र गोसंपदा ने अपने संपादकीय में गोमांस खाने वालों को जानवर तक करार दिया है। इस लेख में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू पर भी अपरोक्ष हमला बोला गया है। 
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कहा गया है कि गोमांस खाने के उनके बयान से गोभक्तों और राष्ट्रभक्तों को मानसिक आघात पहुंचा। बल्कि पत्रिका के संपादक देवेंद्र नायक ने गोमांस भक्षियों को जानवर (सूअर) करार देते हुए कानूनी कार्रवाई की चुनौती भी दी है।

वहीं गोमांस का समर्थन कर विवाद को हवा दे रहे लोगों पर निशाना साधते हुए पांचजन्य ने अपने विशेष संपादकीय में कहा है कि दूसरे की धार्मिक भावनाओं का आदर करना भारत के संविधान की मूलभूत बातों में से एक है। 

न्यायालय ने देश में गाय-बैल-बछड़े की हत्या पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय कानून की भी पैरवी की है। मगर सेकुलर राजनीति और लाल किताब के पन्नों में कैद बुद्धिजीवियों के लिए हिन्दुओं की आध्यात्मिक मान्यताओं और भावनाओं की  कोई कीमत नहीं है।
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संघ ने कहा गांधी के भगवा एजेंडे की होगी जीत

संघ का कहना है कि महात्मा गांधी और विनोबा भावे के लिए गोरक्षा का मामला विशुद्ध राष्ट्रहित का मुद्दा था। मगर सेकुलरिज्म बनाम साम्प्रदायिकता का नाम देकर तथाकथित सेकुलर राजनीति खदबदा रही है।

उसका दावा है कि आज की सेकुलर राजनीति और वामपंथी बुद्धिजीविता के मापदंडों पर गांधी का ये भगवा एजेंडा निश्चित रूप से भारी पड़ने जा रहा है।

संघ का कहना है कि जब कभी गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठती है, तब भारत के सौ करोड़ हिन्दू समाज की भावनाओं का कोई संज्ञान नहीं लिया जाता।

वेदों को भी तोड़-मरोड़ के गोहत्या के संदर्भ निकाले जा रहे हैं। जबकि वेदों में कहीं पर भी गोहत्या अथवा गोमांस को स्वीकृति नहीं दी गयी है।

देश के सांप्रदायिक माहौल पर चिंता जताकर इस्तीफा देने वाले साहित्यकारों पर निशाना साधते हुए संघ मुखपत्र ने लिखा है कि सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयतें को प्रतिबंधित करने की फुर्ती के मामले में भारत ने इस्लामी मुल्कों को भी पीछे छोड़ दिया था।

तब किसी लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं हुई थी। उसने शाहबानो के मामले का भी हवाला दिया है। जब उसके साथ हुए अन्याय को अल्पसंख्यकों का मजहबी मामला कहा गया।
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