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मोदी के संसदीय क्षेत्र में किसे मिलेगी जीत?

Thu, 11 Sep 2014 08:55 AM IST
मनोज श्रीवास्तव/अमर उजाला, वाराणसी
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रोहनिया विधानसभा क्षेत्र का दलित बहुल गांव भुल्लनपुर। 55 वर्षीय खुदीराम। कहते हैं कि चुनाव में तो हम लोग बरसों से हाथी का बटन ही दबाते रहे हैं। इस बार चुपचाप बैठे थे पर अब संकेत मिल गया है। दलित मोमबत्ती निशान वाला बटन दबाने में हिचकेंगे नहीं। लेकिन बगल में खड़ा नौजवान अर्जुन प्रसाद बुजुर्ग खुदीराम को टोकता है और कहता है कि हाथी की गैरमौजूदगी में हमारे परिवार के लोग मंत्री जी (सुरेंद्र पटेल) के साथ रहेंगे। उन्होंने हमारे नातेदार की लड़की की शादी में मदद की है। हां, हम औरों का दावा नहीं करते।
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इस एक गांव का हाल देखने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के रोहनिया विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव की एक झलक मिल ही जाती है। दरअसल बसपा द्वारा निर्दल रमाकांत सिंह मिंटू को परोक्ष समर्थन के बाद प्रचार के दूसरे चरण में तस्वीर थोड़ी बदल रही थी, पर अंतिम दौर में भाजपा ने अपना दल के समर्थन में योगी आदित्यनाथ, कलराज मिश्र और रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा को मैदान में उतारकर स्थिति को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, ताकि विपक्ष को प्रधानमंत्री पर हमले का कोई मौका न मिले।

आधा शहरी आधा ग्रामीण बस्ती वाले रोहनिया क्षेत्र के शहरी इलाके में नवविकसित कालोनियां हैं जहां भाजपा का असर साफ-साफ देखा जा सकता है। वहीं ग्रामीण इलाकों में सब्जी की खेती करने वालों की तादाद ज्यादा है। अन्य जातियों की अपेक्षा पटेलों और भूमिहारों का हर क्षेत्र में वर्चस्व है। अपना दल के संस्थापक स्वर्गीय सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया ने कानपुर से आकर इस क्षेत्र को अपना कर्मक्षेत्र भी इसी वजह से बनाया। शुरू में यहां चुनाव अपना दल और सपा के बीच सिमटा दिख रहा था, पर बसपा का परोक्ष समर्थन मिलने के बाद निर्दल रमाकांत सिंह मिंटू तीसरे कोण बनकर उभरने लगे। मिंटू के बढ़े ग्राफ के साथ यह जिक्र जरूरी है कि 18 फीसदी से अधिक भूमिहारों की आबादी वाली इस सीट पर प्रमुख दावेदारों में कांग्रेस (भावना पटेल), अपना दल (कृष्णा पटेल) और सपा (महेंद्र पटेल) के प्रत्याशी पटेल बिरादरी से हैं, जबकि मिंटू भूमिहार। सवर्ण बिरादरी से कोई अन्य सशक्त दावेदार मैदान में नहीं है।
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किसके सिर होगा जीत का सेहरा?

गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी के तौर पर मिंटू दूसरे स्थान पर रहे थे जबकि प्रमुख दावेदारों में तीन मनोज राय-सपा, संजय राय-भाजपा, रमाकांत सिंह मिंटू-बसपा भूमिहार बिरादरी से ताल्लुक रखते थे। कांग्रेस ने डा. भावना पटेल तथा कौमी एकता दल ने शिवाजी पटेल को मैदान में उतारा है पर दोनों अपने प्रचार को रफ्तार नहीं पकड़ा पाए हैं। लोकसभा चुनाव तक बसपा में सक्रिय रहीं भावना के बारे में स्थानीय कांग्रेसी यह तक नहीं बता पा रहे हैं कि उन्होंने पार्टी कब ज्वाइन की। कमोबेश यही हाल शिवाजी पटेल का है।

हालांकि कौमी एकता दल के अध्यक्ष अफजाल अंसारी ने उनके समर्थन में मुस्लिम बहुल कई इलाकों में सभाएं कीं पर चौराहों-चट्टियों में उनके नाम पर बहस नहीं छिड़ी। इस चुनाव पर अपना आकलन पेश करते हुए बीएचयू में प्रबंध शास्त्र के प्रोफेसर अलोक राय कहते हैं कि लोकसभा का चुनाव केमेस्ट्रि का था पर यह उपचुनाव फिर उसी अंकगणित का है जिस पर हिन्दी पट्टी की परंपरागत राजनीति होती है। जो अपने पक्ष में जातियों को ज्यादा गोलबंद कर लेगा, जीत का सेहरा उसी के सिर होगा।

अनुप्रिया बनाम मंत्री जी
यूं तो अपना दल से कृष्णा पटेल व सपा से महेंद्र पटेल प्रत्याशी हैं पर अपना दल की कमान कृष्णा पटेल की बेटी सांसद अनुप्रिया व सपा की कमान महेद्र के भाई व लोकनिर्माण राज्यमंत्री सुरेंद्र पटेल ने संभाल रखी है। फिलहाल दोनों ही क्षेत्र में मौजूद 40 फीसदी से अधिक पटेल बिरादरी पर अपनी पकड़ पुख्ता करने के लिए न केवल व्यापक जनसंपर्क कर रहे हैं बल्कि एक दूसरे पर जोरदार हमले भी कर रहे हैं। सुरेंद्र, अनुप्रिया पर विकास निधि का पैसा क्षेत्र में न खर्च करने का आरोप लगाते हुए उन्हें विकास विरोधी करार दे रहे हैं तो अनुप्रिया उन्हें बहुरूपिया की संज्ञा दे रही हैं।

अनुप्रिया प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उनके संसदीय क्षेत्र में कराए जाने वाले विकास कार्यों की अधिक से अधिक रोशनी रोहनिया में लाने का वादा कर रही हैं तो सुरेंद्र पटेल प्रदेश में अपनी सरकार होने का हवाला देकर बिजली, सड़क आदि की व्यवस्था दुरुस्त कराने की बात कर रहे हैं। पर कोरौता चौराहे पर टेलरिंग की दूकान चलाने वाले मास्टर किशोरीलाल पटेल कहते हैं कि चुनाव के दिनों में किए जाने वाले वादों व आश्वासनों की हकीकत अब सारा समाज समझने लगा है।
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