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'ALIGARH' के रिक्शेवाले को है हत्या का डर

Sat, 27 Feb 2016 04:20 PM IST
विनीत खरे/ बीबीसी संवाददाता, अलीगढ़
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अलीगढ़ में रिक्शा चलाने वाले अब्दुल (बदला हुआ नाम) को डर है कि ‘अलीगढ़’फिल्म आने के बाद कहीं उनकी जान पर न बन आए। अब्दुल ने बीबीसी से कहा, “अलीगढ़ फिल्म को लेकर इलाके के लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं।
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कहते हैं तुम्हारी कहानी है, तुम तो हीरो बन गए। यह चर्चा भी हो रही है कि फिल्म आएगी तो उसका विरोध किया जाएगा। पर मुझे डर है कि कहीं मेरी जान पर न बन आए। कोई मुझे मार न दे।” अब्दुल ही वो रिक्शा चालक हैं, जिनके अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरास के साथ समलैंगिक संबंध थे और दो स्थानीय लोगों ने 2010 में प्रोफेसर सीरास के घर में घुसकर इस संबंध का वीडियो तैयार किया था।

इसके कुछ महीने बाद प्रोफेसर सीरास अपने घर में मृत पाए गए। फिल्म निर्देशक हंसल मेहता ने इस सच्ची घटना के आधार पर ‘अलीगढ़’फिल्म बनाई है जिसमें मनोज बाजपेयी ने प्रोफेसर का किरदार निभाया है। फिल्म में जहाँ प्रोफेसर सीरास की तकलीफों और संघर्षों को संवेदनशील तरीके से उकेरा गया है वहीं रिक्शेवाले की भूमिका आई-गई सी लगती है। पर असली जीवन में प्रोफेसर सीरास की मौत के बाद अब्दुल की तकलीफें लगातार बढ़ती गईं लेकिन उनकी तरफ किसी की नजर नहीं गई।
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अब्दुल ने सुनाई सीरास के संबंध की कहानी

बीबीसी ने अलीगढ़ जाकर उस रिक्शेवाले को ढूँढा और उससे बात की। पढ़िए अब्दुल से विनीत खरे की बातचीत के संपादित अंश उन्हीं की जबानी - मेरा गांव अलीगढ़ से 50-60 किलोमीटर दूर खिरीरी मस्तीपुर में है। मेरे पापा सालों से दिल्ली में रहे।

मेरी दिल्ली में पैदाइश थी। 1981 में मेरा जन्म हुआ। हम 1992 में बाबरी मस्जिद दंगों के बाद दिल्ली छोड़कर अलीगढ़ आ गए थे।  मैंने 1995-96 में रिक्शा संभाल लिया था। मैंने पढ़ाई लिखाई नहीं की। परिवार में छह लोग थे– माता पिता, दो बहनें, एक भाई और एक मैं। बहनों की मैंने शादी कर दी। भाई मजदूरी करते हैं।

पापा भी मजदूर थे। बचपन बहुत मुश्किलों में बीता। जब पापा बीमार पड़ जाते थे तो दो-दो तीन-तीन दिनों में रोटी खाया करते थे। जैसे-जैसे हम समझदार होते गए अपने पैरों पर खड़े होते गए। मैंने 14 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। शुरुआत से ही रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। सोचा पैसे आएंगे तो घर का खर्च चलेगा।

उस वक्त 60-70 रुपए कमा लेते थे। अम्मा ने कहा कुछ काम सीख लो लेकिन मैंने कहा यही सही है। अम्मी बहुत मजहबी थीं। उस वक्त का अलीगढ़ पूरी तरह से बदला हुआ था, पूरा इलाका खुला सा था। विश्वविद्यालय में जहां चाहे रिक्शा लेकर चले जाते थे।

अब्दुल को घर ले गए थे प्रोफेसर सीरास

मैं आर्ट्स फैकल्टी के आसपास रिक्शा चलाता था। (वहीं 2009 में अब्दुल की प्रोफेसर सीरास से मुलाकात हुई)। उन्होंने (अपने घर मेडिकल कॉलोनी तक) मात्र 10 रुपए (का किराया) तय किया। छोड़ दिया। उन्होंने मुझे ऊपर बुला लिया कि पैसे ले जाओ अपने। वहां पर हम बैठे रहे। (यहीं पहली बार अब्दुल और प्रोफेसर सीरास ने समलैंगिक संबंध बनाए)।

करीब 15 दिनों के बाद मुझे वह फिर मिले। मैं इंजीनियरिंग कॉलेज से ऑर्ट फैकल्टी की तरफ जा रहा था। ये (प्रोफेसर सीरास) ऑर्ट फैकल्टी की ओर जा रहे थे। वह रिक्शे पर थे। उन्होंने उस रिक्शे वाले को पैसे देकर मुझे रोक लिया। मैं उनको (मेडिकल कॉलोनी स्थित घर) लेकर चला गया। उन्होंने मुझसे मेरे घर के हालात पूछे कि कैसे खर्चा चलता है। मैंने अपनी बहन की शादी की बात बताई। एक बहन और एक भाई की शादी करनी है।

उन्होंने मुझे बताया कि उनका कुछ दिनों में रिटायरमेंट है और कहा था कि मैं मराठी हूँ और तुम्हारा दिलोजान से ख्याल रखूंगा। यह भी कि कुछ दिनों बाद मैं रिटायरमेंट के बाद अमरीका चला जाऊंगा तो तुम घबराना मत। कभी मैंने खुद के समलैंगिक होने के बारे में सोचा नहीं था। पर डॉक्टर साहब के साथ मुलाकात के बाद मुझे पता चला कि मैं भी समलैंगिक हो सकता हूँ। पर वह किसी के सामने नहीं दिखाते थे कि हमारे ताल्लुकात हैं।

आज तक मैंने उनसे कभी भी पैसा नहीं मांगा। उन्होंने कभी भी एक पैसा नहीं दिया मुझे। वो मुझसे कहते थे कि मैं तुमसे इसी कारण मोहब्बत करता हूं क्योंकि (तुमने) पैसे कभी नहीं मांगे। उनकी मौत से मुझे बहुत झटका लगा था। अगर वह होते तो मैं शायद आज रिक्शा न चला रहा होता। वह मेरी बहुत मदद करते। मुझे उन पर बहुत भरोसा था। उनकी बहुत सी बातें याद आती हैं।

खबर छपने के बाद डॉक्टर साहब से नहीं हुई मुलाकात

उस दिन (आठ फरवरी 2010 को) मैं डॉक्टर साहब को दो बजे घर छोड़कर गया था। उन्होंने मुझसे तीन-चार बजे आने को कहा। जैसे ही हम कमरे में गए, मीडिया वाले आ गए। उस समय पता नहीं दरवाजा कैसे खुला रह गया था।

पता नहीं क्या हुआ, तीन लड़के सीधे घुसे चले आए। उन्होंने तुरंत कैमरा ताना, बटन दबा दिया। उन्हें सब पता था कि स्विच इधर है, लाइट इधर है। कुछ समझ नहीं आया आज तक। डॉक्टर साहब (प्रोफेसर सीरास) ने कहा कि तुम लोग सोचते हो कि मैं कुछ ऑफर तुमको दूंगा लेकिन तुम गलत सोचते हो। मैं कोई ऑफर नहीं दूंगा।

उस वक्त बाहर थोड़ी बारिश पड़ रही थी। रिक्शा लेकर मैं अपने घर गया। घरवालों ने पूछा क्या बात है। मैं घबराया हुआ था। छह-सात दिन घर पर रहा। जान-पहचान वाले ने बताया कि मीडिया में तुम्हारी खबर छपी है। उसके बाद से मेरी उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई। अखबार से मुझे उनकी मौत का पता चला। उसके बाद मैं और डर गया कि कहीं पुलिस मुझ पर और शक न करे। पुलिस ने मुझे बुलाकर सवाल जवाब किए।

कुछ दिनों तक कई बार मुझे ले जाकर छोड़ा गया। मैं उस दौरान काफी परेशान रहने लगा दिमागी तौर पर कि मैं कहीं फंस न जाऊं। मैंने तो कुछ किया नहीं है। थाने बुलाकर पूछताछ करते थे। ये दो महीने चला। मैं कहीं भागता नहीं था। मुझे अपनी बेगुनाही साबित करनी थी। मुझे लगा उन्होंने आत्महत्या कर ली। वह बहुत सुलझे हुए आदमी थे। कोई नहीं चाहेगा कि इस हाल में पकड़ा जाऊं कि उनके विद्यार्थी उन्हें किस नजर से देखेंगे।

डॉक्टर साहब के ख्याल से लगायी आग

मैंने तब तक अपनी पत्नी को डॉक्टर साहब की बात नहीं बताई थी। मैं सोचता था कि कहीं बता दिया तो कहीं गुस्सा हो जाए, छोड़कर चली जाए। ये सही नहीं लगा कि शादी के बाहर ऐसा कर रहा हूँ। मैं खुद को समझाता था कि डॉक्टर साहब मेरा साथ देंगे और मैं डॉक्टर साहब का साथ दूंगा।

उन्होंने बताया था कि दो लड़के और दो लड़कियां साथ संबंध बनाकर रह सकते हैं। प्रोफेसर सीरास की मौत के बाद जब पत्नी ने पूछा तो मैंने कहा कि मैंने कुछ गलत नहीं किया। जब मैं जल गया था तो मेरी पत्नी ने मेरी बहुत सेवा की थी। उनके अब्बा ने कहा था कि तुम छोड़कर आ जाओ लेकिन वह गई नहीं। वह बहुत अच्छी हैं। रोजी रोटी के लिए डर-डर कर निकलता था, कहीं कोई मार न दे। उनकी संपत्ति के पीछे रिश्तेदार पड़े हैं।

कहीं संपत्ति के झगड़े में मैं न फंस जाऊं। कहीं लोग मुझे मरवा न दें इसलिए मेरा निकलना मुश्किल हो गया था। हर दम डॉक्टर साहब का ख्याल दिल में आता था। आग इसलिए लगाई क्योंकि पुलिस हमेशा उठाकर ले जाती थी। यही पूछते थे कि किसने किया, क्या हुआ। मिट्टी का तेल रखा था घर में। मैंने खुद पर डाल लिया। माचिस दिखा दी।

जब बीवी ने आग देखी तो उन्होंने कंबल फेंक दिया मुझ पर। उस दौरान खाना भी पकना मुश्किल हो गया था। जब मैंने आग लगा ली थी इलाज तक के लिए पैसे नहीं थे। उस वक्त मैं बच गया। लेकिन अब बार-बार चर्चा हो रही है कि फिल्म चलेगी, विरोध होगा, कहीं ऐसा न हो कि मेरी जान पर बन आए।

फिल्मकारों को मुझसे जानना चाहिए था सच

जब मैंने सुना कि 377 कानून पास होने वाला है तो मुझे लगा कि जब डॉक्टर साहब इतनी मोहब्बत करते थे तो कानून मुझे इंसाफ दिलाएगा। वह कहते थे कि कानून पास हो गया तो तुम्हें सुकून मिलेगा। जाहिर सी बात है वो मुझसे शादी करते।

क्या पता वह इसी कानून के चक्कर में रुके हुए हों कि कानून पास हो कैसे भी तो हम लोग शादी कर लें। जाहिर सी बात है कि मुझे भरोसा था। मैंने इतना भरोसा कर रखा था, थोड़ा सा भरोसा करने में मुझे क्या डर था। मैंने (उनसे) कभी नहीं पूछा कि क्या आप मुझसे शादी करेंगे। जब इस वाक्‍ये पर फिल्म बनी तो मुझसे फिल्म वालों ने कोई बात नहीं की।

एक महिला ने फोन किया। उन्होंने एक घंटे बात की। कहा फिल्म रिलीज होने से पहले हम आपसे मिलेंगे लेकिन मुझसे कोई नहीं मिला। सब ऐसे मुझसे वायदा करके चले जाते लेकिन कोई कुछ नहीं करता। मुझे पैसा मिलना चाहिए। आपने इतना पैसा फिल्म पर खर्च किया, कुछ मुझ पर खर्च करें। डॉक्टर साहब ऐसे थोड़े बैठते थे जैसे मनोज बाजपेयी को दिखाया गया है। पोस्टर देखा है। अगर आपको कहानी चाहिए मुझसे आकर आप मिलते।
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'मुझे मिले डॉक्टर साहब की पेंशन'

मैं बहुत करीब रहा हूं डॉक्टर साहब के। उनका पार्टनर रहा हूं। मुझसे मालूम करते कि वो कैसे खाते थे, कैसे उठते थे, कैसे बैठते थे, कैसे जीने पर आते-आते थक जाते थे। कैसे हम इंजाय करते थे, कैसे हँसते थे। जो वायदे डॉक्टर साहब ने मुझसे किए वो कोई पूरा कराए तो मैं समझूंगा कि कुछ इंसाफ हुआ।

उनकी पेंशन मुझे मिले तो यह अच्छी बात है। जैसे मियां-बीवी के संबंध होते हैं। उनकी फोटो अखबार में से काटकर रखी हुई है। मैं अखबार की सारी कटिंग रखता हूँ। कोई कुछ भी पाल लेता है, पंछी, चिड़िया, तोता कुछ भी सही, अगर एक दो साल आदमी के पास रहे, वो एकदम उड़ जाए तो अहसास होता है उस बात का। मैं मर गया तो मेरी पांच बेटियां हैं, कौन पालेगा उन्हें।

आपको पता है कि महिला को इस समाज में किस नजर से देखा जाता है। मेरी बेटियां छोटी-छोटी हैं। कल को बड़ी होंगी। अगर डॉक्टर साहब होते, तो मेरे बच्चे अच्छे स्कूलों में होते, मेरे पास पैसा होता। मेरे पास सब कुछ होता, मेरा कोई अपना कारोबार होता। लेकिन ऐसा कुछ भी हो न सका।
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