लोकसभा चुनाव से ठीक पहले देश का पहला लोकपाल चुनने में जुटी यूपीए सरकार को बड़ा आघात लगा है।
लोकपाल चयन के लिए बहुस्तरीय चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर बीते हफ्ते कानूनविद् फली नरीमन के बतौर सदस्य लोकपाल खोज समिति से खुद को अलग करने के बाद अब जस्टिस केटी थॉमस ने इस समिति का नेतृत्व करने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस थॉमस ने भी नरीमन की तरह ही लोकपाल के चयन के लिए अपनाई गई बहुस्तरीय प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा है कि चयन समिति के रहते खोज समिति की वास्तव में कोई जरूरत ही नहीं है।
लोकपाल चयन की बहुस्तरीय प्रक्रिया पर उठाए सवाल
प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिख कर जस्टिस थॉमस ने लिखा है कि जब खोज समिति के निर्णय को चयन समिति पलट सकती है, तब ऐसी स्थिति में लोकपाल के चयन के लिए खोज समिति का औचित्य उनके समझ के बाहर की बात है। खोज समिति के बिना भी चयन समिति लोकपाल चुन सकती है और सरकार को ऐसा ही करना चाहिए।
बीते हफ्ते नरीमन ने भी खोज समिति का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था। उन्होंने लोकपाल के चयन के लिए बनाई गई बहुस्तरीय प्रक्रिया में सर्वश्रेष्ठ लोगों की अनदेखी की आशंका जताई थी।
8 सदस्यीय खोज समिति के गठन का प्रावधान
हाल ही में संसद में पारित लोकपाल कानून में लोकपाल के चयन के लिए 8 सदस्यीय खोज समिति के गठन का प्रावधान किया गया था। इस प्रावधान के तहत खोज समिति द्वारा तैयार पैनल पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति को अंतिम फैसला करने का अधिकार दिया गया था।
चयन समिति में लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा मनोनीत सुप्रीम कोर्ट का कोई जज और एक प्रख्यात न्यायविद् को शामिल करने का प्रावधान किया गया था।
क्या है चयन का प्रावधान
लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून 2013 के तहत केंद्र के स्तर पर एक लोकपाल और राज्य के स्तर पर एक-एक लोकायुक्त की नियुक्ति का प्रावधान है।
इस कानून में लोकपाल और इसके सदस्यों की नियुक्ति के लिए 8 सदस्यीय खोज समिति और चयन समिति गठित करने का प्रावधान है। इनमें खोज समिति लोकपाल और उसके सदस्यों का पैनल तैयार कर चयन समिति के पास भेजेगी।
प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति इस पैनल पर विचार कर अंतिम फैसला करेगी। चयन समिति खोज समिति की सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। विवाद की जड़ यही है।