जीवन साथी के साथ हनीमून के दौरान यौन संबंधों से इनकार करना क्रूरता नहीं है। बांबे हाई कोर्ट ने यह फैसला देकर फैमिली कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि इस तरह की ‘क्रूरता’ के आधार पर शादी तोड़ी जा सकती है।
हाई कोर्ट का यह कहना है कि पत्नी का शर्ट-पैंट पहन कर दफ्तर जाना और शादी के ठीक बाद काम के सिलसिले में शहर से बाहर जाना भी पति के प्रति क्रूरता नहीं है।
जस्टिस वीके ताहिलरमानी और जस्टिस पीएन देशमुख ने इस सप्ताह की शुरुआत में एक फैसले में कहा कि वैवाहिक जीवन को पूर्णता के आधार पर आंका जाना चाहिए और किसी खास अवधि के दौरान हुई इक्का-दुक्का घटनाओं को क्रूरता नहीं माना जाना चाहिए।
दरअसल बुरा व्यवहार उसे माना जाता है, जो एक लंबी अवधि तक हो। पति या पत्नी का चाल-चलन और व्यवहार ऐसा हो जाए कि उसके साथ ज्यादा दिन तक रहना संभव न हो तो उसे मानसिक क्रूरता कह सकते हैं।
पति-पत्नी के बीच छोटी-मोटी नाराजगी, झगड़ा, हल्की खींचतान हर परिवार में होती है और इन्हें क्रूरता करार देकर तलाक का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सिर्फ लगातार गैरवाजिब और निंदनीय व्यवहार की वजह से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना मानसिक क्रूरता है। मौजूदा मामले में इस तरह का कोई सुबूत नहीं है।
दरअसल हाई कोर्ट की यह बेंच 29 वर्षीय शादीशुदा महिला की अपील पर सुनवाई कर रहा थी।
महिला एक फैमिली कोर्ट की ओर से दिए गए उस फैसले से परेशान थी, जिसमें पति की ओर से लगाए गए मानसिक क्रूरता के आरोपों के आधार पर तलाक की मंजूरी दे दी गई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने पति की ओर से लगाए गए आरोपों को मानसिक क्रूरता नहीं माना।