भारत में करीब 800 से ज्यादा पॉर्न वेबसाइटों पर बैन लगाने के सरकार के फैसले को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई है। सरकार का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के करीब एक महीने बाद आया है जिसमें मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तु ने पॉर्न वेबसाइटों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के आदेश देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का पूरी तरह से उल्लंघन है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि यह अदालत ऐसे अंतरिम आदेश नहीं दे सकती। अगर कोई अदालत के सामने यह आकर कहता है, 'मैं 18 साल का हूं और मैं बालिग हूं। आप कैसे मुझे बंद कमरे के अंदर यह देखने से रोक सकते हैं? यह अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।' उन्होंने यह भी कहा कि यह निश्चित तौर पर एक गंभीर मुद्दा है और केंद्र सरकार को इस पर कोई ठोस कदम उठाना चाहिए।
साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक पॉर्न वेबसाइटों पर लगाया गया यह प्रतिबंध पूरी तरह से समय और पैसे की बर्बादी है। पॉर्न कंटेंट इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है और इस पर पूरी तरह से रोक लगाना नामुमकिन है। अगर सरकार इस पर पूरी तरह से रोक लगाना चाहती है तो इसके लिए उसे हर साल करोड़ो रुपये खर्च करके अपने वेब कंटेंट फिल्टरिंग सिस्टम को अपडेट रखना होगा।
अमेरिका में भी असफल रहा 'बैन'
अखबार मेल टुडे में छपी एक खबर के मुताबिक साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल का कहना है कि प्रॉक्सी सर्वर का उपयोग करके भारत के बाहर के सभी प्रतिबंधित वेवसाइटों को खोला जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा है कि वेवसाइटों पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने लोगों को एक तरह से उकसाने का काम किया है।
दुग्गल के मुताबिक इससे और ज्यादा लोग इनको खोलने की कोशिश करेंगे जिससे पेज ट्राफिक और बढ़ेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि पॉर्न वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाना भले ही संविधान के अनुच्छेद 21 के मुताबिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हो लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के तहत अश्लील सामग्रियों का प्रकाशन और संचारण एक गंभीर अपराध है।
साइबर जानकारों की मानें तो पॉर्न वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से बेकार प्रयोग है। हालांकि, यह एक अच्छे काम के लिए उठाया गया कदम है लेकिन इसमें सफलता मिलने की उम्मीद बेहद कम है। अमेरिका और चीन इसका जीता जागता उदाहरण हैं। इन दोनों देशों ने भी अपने यहां कुछ इसी तरह का प्रयोग किया था लेकिन वे नाकाम रहे थे, जिसके बाद उन्होंने अपना दायरा केवल चाइल्ड पोर्नोग्राफी तक ही सीमित कर लिया।
वेबसाइट इंटरनेट का केवल एक पहलू
आइए जानते है कि तकनीकी तौर पर पॉर्न वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाना कैसे पूरी तरह से निरर्थक है।
1. वेबसाइट्स इंटरनेट का केवल एक पहलू मात्र हैं। ऐसे कई कम्यूनिकेशन प्रोटोकॉल हैं जिनका उपयोग करके इंटरनेट उपभोक्ता इन कंटेंट्स तक पहुंच सकते हैं। भले ही वेबसाइटों पर अश्लील सामग्रियों को देखना प्रतिबंधित हो लेकिन 'बिट-टोरेंट' तकनीक का प्रयोग करके इनको डाउनलोड भी किया जा सकता है।
इसी तरह पीयर-टू-पीयर नेटवर्क जैसे eMule और Bulletin Boards का इस्तेमाल करके पॉर्न कंटेंट फाइल्स को आसानी से डाउनलोड और शेयर किया जा सकता है।
2. केवल कुछ ही वेबसाइट को प्रतिबंधित किया जा सकता है इंटरनेट पर इस वक्त करीब 10 हजार से ज्यादा पॉर्न वेबसाइट उपलब्ध हैं। भारत सरकार ने इनमें से केवल कुछ चर्चित वेबसाइट्स समेत कुछ सौ वेवसाइट्स पर ही प्रतिबंध लगाया है।
इसके अलावा कई ऐसे वेबसाइट्स हैं जिन पर अभी तक किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया गया। देशभर में कोई भी इन वेबसाइट्स को केवल एक गूगल सर्च के जरिए आसानी से खोल सकता है।
बैन को किया जा सकता है 'बाइपास'
3. इंटरनेट अपने प्रकृति के अनुरूप पूरी तरह से स्वतंत्र है। इसको कोई भी कहीं से भी आसानी से एक्सेस कर सकता है। सरकार ने हाल के दिनों में ही वेवसाइट्स पर निगरानी रखने का काम शुरू किया है और किसी भी वेबसाइट को ब्लॉक करना उतना आसान नहीं है जितना लगता है।
अगर कोई इन वेबसाइट्स को वास्तम में खोलना चाहता है तो कई ऐसे तरीके हैं जिनके जरिए इन प्रतिबंधों को बाइपास किया जा सकता है। भारत सरकार ने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के साथ मिलकर जिस तरह से इन वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया है उसे आसानी से बाइपास किया जा सकता है। इसके लिए वीपीएन सेवाओं का इस्तेमाल करके इंटरनेट पर किसी भी तरह के प्रतिबंधित वेबसाइट तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
4. भारत सरकार इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों के साथ मिलकर सूची आधारित तरीके से पॉर्न कंटेंट पर प्रतिबंध लगाया है। इसका मतलब है कि एक ऐसी सूची जो बिल्कुल उनके यूआरएल के आधार पर बनाई गई है। ऐसे सूची को सिस्टम में डालने के बाद सर्विस प्रोवाइडर केवल उन्हीं वेबसाइट का एक्सेस करने से लोगों को रोक सकते हैं जिन वेबसाइट्स का सूची में नाम है। इसको आसानी से बाइपास किया जा सकता है।
वेबसाइट कंपनियां अपने वेबसाइट को एक मिरर साइट बनाकर ऐसा आसानी से कर सकती हैं। इसके अलावा https से http में इंक्रिप्ट करके भी इन वेबसाइट्स को देखा जा सकता है। ऐसे किसी भी बाइपास को 'कीवर्ड बेस्ड फिल्टरिंग' सिस्टम के जरिए ही रोका जा सकता है। चीन और सउदी अरब जैसे देश ही इस तकनीक का प्रयोग करते हैं लेकिन यह काफी महंगा और उपयोग के लिहाज से काफी कठिन काम है।