प्रचंड बहुमत के साथ देश की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 15 अगस्त पर लाल किले की प्राचीर से दो महत्वपूर्ण ऐलान किए थे। एक था स्वच्छ भारत अभियान और दूसरा डिजिटल इंडिया। स्वच्छ भारत अभियान के जरिये प्रधानमंत्री उस सपने को पूरा करना चाहते हैं जो कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था। प्रधानमंत्री ने खुद झाड़ू थामकर पिछले साल 2 अक्टूबर को इस अभियान की शुरुआत की और बापू की 150 वीं जयंती तक 2019 में करीब 12 करोड़ शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य रखा। क्या पिछले एक साल में हम इस सपने को साकार करने की दिशा में सही कदम बढ़ा पाए, ये अब सोचने का वक्त है।
एक जनआंदोलन कहा जा रहा सफाई अभियान कुछ दिन तो सुर्खियों में रहा लेकिन कुछ महीनों बाद ना तो कोई ब्रांड एंबेसडर नजर आया और ना ही कोई नवरत्न। हाथ में झाड़ू थामकर मंत्री से लेकर संतरी तक कुछ दिन तो सुर्खियों में रहे लेकिन ये तस्वीरें बाद में महज रस्म अदाएगी बनकर ही रह गईं। भारत के शहरों में साफ-सफाई को लेकर जो रिपोर्ट आई है वो निराश करने वाली है। उत्तर भारत के शहरों में साफ-सफाई की मानसिकता में फिलहाल कोई बदलाव नजर नहीं आया है।
'स्वच्छ भारत' नाम से कराए गए शहरी विकास मंत्रालय के सर्वे में देश की राजधानी तक टॉप 10 में जगह नहीं बना सकी है। यहां तक कि शीर्ष 10 शहरों में उत्तर भारत का एक भी शहर स्थान नहीं पा सका। स्वच्छ भारत रैंकिंग में कर्नाटक का मैसूर 476 शहरों में पहले स्थान पर आया जबकि मध्यप्रदेश का दमोह इस सूची में सबसे निचले पायदान पर रहा। उत्तर प्रदेश का बुलंदशहर 471वें पायदान के साथ सबसे पिछड़े शहरों में रहा।
हरियाणा के रेवाड़ी को 469वां, भिवानी को 473वां और पलवल को 474वां स्थान मिला। इस सर्वे से एक बात साफ है कि यहां टीवी और अखबारों की सुर्खियों का कोई खास असर नहीं दिखता। स्वच्छ भारत का सपना पूरा करने के लिए इन इलाकों में किसी और रणनीति की जरूरत है। स्थानीय नगरीय निकायों के कामकाज के ढर्रे में बदलाव के साथ-साथ लोगों को व्यक्तिगत स्वच्छता के प्रति जागरुक करने के लिए कुछ नए प्रयोगों की जरूरत है।
शौचालयों को इस्तेमाल लायक बनाए रखना चुनौती
प्रधानमंत्री ने इस संकल्प के साथ इस योजना की शुरुआत की थी कि एक साल के भीतर देश के सभी स्कूलों में शौचालय बना दिए जाएंगे जिनमें लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था होगी। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक 31 जुलाई तक 2.86 लाख शौचालयों का निर्माण हो चुका था जबकि देशभर के स्कूलों में कुल 4.19 लाख टॉयलेट का निर्माण होनाहै। अंडमान निकोबार, दमन एवं दीव, दादर और नगर हवेली, केरल पुडुचेरी, सिक्किम ऐसे राज्य हैं, जो शत प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर चुके हैं। गुजरात और कर्नाटक भी शत प्रतिशत लक्ष्य को पूरा करने के काफी नजदीक हैं।
स्कूलों में शौचालयों का निर्माण कर अगर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं, तो ये महज खानापूर्ति ही होगी क्योंकि स्कूलों में अव्वल तो शौचालय हैं नहीं और अगर बना दिए जाते हैं तो वो इस्तेमाल के लायक बने रहें, इस बात पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। सरकारी स्कूलों में जहां शिक्षकों तक का टोटा है वहां क्या शौचालयों के इस्तेमाल लायक बने रहने के लिए सरकारें सफाई कर्मचारियों की तैनाती करेंगी। एक सरकारी अध्ययन में कहा गया है कि शौचालय बनाना ही मददगार नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग इनका प्रयोग ही नहीं करते हैं। शौचालयों के निर्माण के साथ-साथ उनके इस्तेमाल के लिए लोगों को प्रेरित किया जाना भी बहुत जरूरी है।
विश्व शौचालय दिवस पर भी संयुक्त राष्ट्र ने जो रिपोर्ट जारी की थी वो वाकई शर्मिंदा कर देने वाली है। यूएन की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सबसे ज्यादा लोग खुले में शौच जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 60 करोड़ लोग खुले में शौच जाते हैं, जो दुनिया के देशों की तुलना में सबसे ज्यादा है। भारत में 47 फीसदी ( करीब 60 करोड़) लोग खुले में शौच जाते हैं। वहीं इंडोनेशिया में 5.4 करोड़, पाकिस्तान में 4.1 करोड़, नेपाल में 1.1 करोड़ और चीन में एक करोड़ लोग खुले में शौच जाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दूसरा बड़ा ऐलान था डिजिटल इंडिया का। आम आदमी के सशक्तिकरण के लिए डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसके तहत हाल ही में डिजिटल इंडिया वीक मनाया गया। प्रधानमंत्री का सपना है कि डिजिटल इंडिया अभियान के तहत लोगों को सूचना और सेवाएं समय पर प्रभावी और पारदर्शी तरीके से मुहैया कराई जाएंगी लेकिन ग्रामीण और निचले स्तर पर फिलहाल इसमें कोई खास तरक्की नजर नहीं आती।
असल भारत को भी मिले डिजिटल इंडिया का फायदा
हाल ही में डिजिटल इंडिया अभियान की शुरुआत के दौरान पाया गया कि देश में 97 करोड़ मोबाइल फोन का प्रयोग किया जाता है। मोबाइल क्रांति के मौजूदा दौर में जहां ग्रामीण भारत के हर तीन में से दो घरों में एक मोबाइल फोन है, वहीं अब भी ग्रामीण इलाकों में 28 फीसदी घर ऐसे हैं, जहां न तो लैंडलाइन है और न ही मोबाइल फोन। निष्कर्ष ये है कि डिजिटल इंडिया का पूरा लाभ ग्रामीण भारत को भी मिले सरकार को इसे भी सुनिश्चित करना जरूरी है।
भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 24.5 करोड़ यूजर्स के साथ भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है जबकि अमेरिका 28 करोड़ यूजर्स के साथ दूसरे और चीन 64 करोड़ इंटरनेट यूजर्स के साथ पहले स्थान पर है। एक साल में जहां चीन और अमेरिका में क्रमश: चार और सात फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई वहीं भारत में 14 फीसदी की दर से इंटरनेट यूजर्स बढ़े हैं। अमेरिका की तुलना में भारत में करीब दोगुनी रफ्तार से इंटरनेट उपभोक्ता बढ़ रहे हैं और इस रफ्तार से भारत जल्द ही अमेरिका को पछाड़कर दूसरे स्थान पर आ जाएगा।
आबादी के हिसाब से देखें तो इंटरनेट यूजर्स के मामले में भारत, चीन और अमेरिका से काफी पीछे है। चीन की आबादी दुनिया की आबादी की करीब 19 फीसदी है जबकि उसके इंटरनेट उपभोक्ता 22 फीसदी से ज्यादा हैं। अमेरिका की आबादी दुनिया की करीब साढ़े चार फीसदी जबकि उसके इंटरनेट यूजर्स करीब साढ़े नौ फीसदी यानी आबादी के प्रतिशत की तुलना में करीब दोगुने हैं। भारत ही तीनों देशों में ऐसा है जिसके इंटरनेट यूजर्स आबादी के प्रतिशत की तुलना में करीब आधे हैं। भारत की आबादी दुनिया की आबादी की करीब 17.5 फीसदी है जबकि इंटरनेट उपभोक्ता महज करीब आठ फीसदी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है डिजिटलीकरण में हम दुनिया के बड़े देशों से कितने पिछड़े हैं।
खुले में शौच जा रही 47 फीसदी आबादी और 17.5 फीसदी जनसंख्या के मुकाबले महज आठ फीसदी इंटरनेट उपभोक्ता। ये दो ऐसे आंकड़े हैं जो चिंता की वजह हैं। ये आंकड़े अगर एक दूसरे की जगह ले सकें तो महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों का सपना साकार हो सकता है।