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'मैं हूं रामलीला, अब देखूंगा केजरीवाल लीला'

Thu, 26 Dec 2013 03:41 PM IST
विनोद डबास/अमर उजाला, नई दिल्ली
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मैं रामलीला मैदान हूं। मैं दिल्ली में संप्रदाय सौहार्द बनाने में अहम भूमिका निभा रहा हूं। मेरे शरीर के हिस्से पर एक मस्जिद बनी है तो कुछ दूरी पर एक मंदिर।
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यहीं रामलीला मंचन की शुरुआत हिंदू-मुसलमानों ने मिलकर की। मैं जेपी की ऐतिहासिक रैली व देश में इमरजेंसी लगने का गवाह रहा हूं। मेरी पूरी कहानी आगे क्लिक करके जानें-

'फिर बनाने जा रहा हूं नया इतिहास'

देश के अधिकतर नेताओं ने राजनीतिक बुलंदी पर पहुंचने के लिए मेरा ही सहारा लिया। अन्ना व केजरीवाल का जन आंदोलन भी यहीं हुआ और अब मुझे नया अनुभव भी होने जा रहा है। इस बार फिर ऐतिहासिक घटनाक्रम का मैं गवाह बन रहा हूं।

एक बार केजरीवाल को मेरे पास आंदोलन चलाने की अनुमति नहीं मिली थी, लेकिन अब वही सरकारी तंत्र उसके लिए सारी व्यवस्था बनाने में जुटा है। इतिहास के पन्नों पर किसी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह का भी मैं गवाह बनने जा रहा हूं।

खेत से मैदान तक का सफर

प्राचीन काल में मैं मैदान नहीं बल्कि इंद्रपत गांव (जो बाद में इंद्रप्रस्थ कहलाया) का खेत था। मेरे शरीर पर गांव के किसान फसल पैदा करके दिल्ली के लोगों का पेट भरते थे। वर्ष 1850 में मैं खेत से मैदान बन गया और मेरे शरीर पर अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने रामलीला का मंचन शुरू करवाया।

अंग्रेज शासकों ने रामलीला मंचन बंद करवा दिया लेकिन मेरा अस्तित्व बरकरार रहा। वर्ष 1911 में पं. मदन मोहन मालवीय ने पुन: रामलीला मंचन की शुरुआत की। तभी से प्रतिवर्ष रामलीला का मंचन हो रहा है।

रामलीला देखने के लिए कई अंग्रेज शासक, देश आजाद होने के बाद अनेक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने दस्तक दी।

लोकनायक ने इंदिरा को ललकारा

वर्ष 1955 में मेरी साज सज्जा की गई, मेरा सिर बनाया गया और मेरे शरीर को सीमाओं में बांध दिया। चीन के प्रधानमंत्री चाउ इन लाई के आने के चलते स्थाई मंच बनाया गया जो आज भी मौजूद है जिस पर खड़े होकर देश के बड़े-बड़े नेताओं ने विरोधी दलों को ललकारा है और सत्ता हासिल की है।

मैं ही इस बात का गवाह हूं कि वर्ष 1975 में लोकनायक जयप्रकाश ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यहीं से ललकारा व उसके अगले ही दिन देश को आपातकाल का सामना करना पड़ गया।

रामदेव के समर्थकों ने खाई पुलिस की लाठी

वर्ष 2011 में ऐसा कृत्य हुआ कि मेरा खून उबाल खा गया, लेकिन मैं कुछ नहीं कर सका। मैं उसी तरह बाबा रामदेव के समर्थकों पर पुलिस की लाठी खाते देखता रहा जैसे द्रोपदी के चीरहरण के दौरान पांडव देख रहे थे।

इसी वर्ष देश से भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए अन्ना हजारे ने अपने अर्जुन अरविंद केजरीवाल एवं अन्य सहयोगियों और हजारों समर्थकों के साथ अनशन किया। हालांकि इस दौरान उन्हें सरकारी तंत्र ने मेरे पास आने की अनुमति नहीं दी थी।
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अब अन्ना के 'अर्जुन' आ रहे मेरे पास

अब अन्ना के 'अर्जुन' पुन: मेरे पास आ रहे हैं मगर वह किसी को ललकारने नहीं बल्कि वह जीवन की नई पारी शुरू कर रहे है। मैं बहुत ही खुश हूं कि उन्होंने सत्ता के गलियारे में पहुंचने व शपथ लेने के लिए मुझे चुना।

मुझे उम्मीद है कि केजरीवाल अवश्य कामयाब होंगे, क्योंकि मुझसे संघर्ष की पारी शुरू करने वाले असफल नहीं होते।
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