श्रीराम के चरित्र के जरिये दिए गए सामाजिक उत्थान के संदेश से अब स्वीडन के लोग भी वाकिफ हो सकेंगे। रामायण का अनुवाद स्वीडिश भाषा में किया जाएगा। इसमें करीब पांच साल लगेंगे।
अनुवाद के बाद इस रामायण को स्वीडन के कार्लस्टड विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में रखा जाएगा। यहां रामायण पर शोध भी किए जाएंगे। बीएचयू के न्यूरोलाजी विभाग के हेड प्रो. वीएन मिश्रा और कार्लस्टड विश्वविद्यालय के धर्म विज्ञान एवं सामाजिक अध्ययन केंद्र के बीच इस पर सहमति बनी है।
यह काम धर्म विज्ञान एवं सामाजिक अध्ययन केंद्र के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर मार्क कार्ट्स की देखरेख में होगा। गौरतलब है कि प्रो. मिश्रा ने देश-विदेश से 1500 से ज्यादा पांडुलिपियों का संग्रह किया है। जल्द ही काशी में तुलसी घाट पर इसके लिए संग्रहालय भी बनाने की तैयारी है।
‘काशी-कार्लस्टड के लोग’ नाम से नया फेसबुक पेज
प्रो. वीएन मिश्रा ने एक दिन पहले कार्लस्टड विश्वविद्यालय में पांडुलिपियों पर व्याख्यान दिया। आयोजन धर्म विज्ञान एवं सामाजिक अध्ययन विभाग की ओर से कराया गया था। कार्यक्रम के दौरान ही उनकी मुलाकात प्रो. मार्क कार्ट्स से हुई।
प्रो. मार्क का काशी से पांच दशक पुराना रिश्ता है। मुलाकात के दौरान उन्होंने काशी की रामलीला और अस्सी-भदैनी मुहल्ले समेत काशी से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा की। कहा कि रामनगर और तुलसीघाट की रामलीला देखने वह इस बार आने वाले थे, लेकिन स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से नहीं आ पाए। उन्होंने मार्च में काशी आने का वादा किया।
मुलाकात के दौरान ही ‘काशी-कार्लस्टड के लोग’ नाम से नया फेसबुक पेज बनाया गया। प्रो. मार्क ने इसका भी उद्घाटन किया। इसमें काशी और स्वीडन के लोगों को जोड़ा जाएगा। एक दूसरे की धर्म-संस्कृति, पर्यावरण, सांस्कृतिक गतिविधियों की जानकारी फेसबुक के जरिए दोनों देशों के लोगों को मिलती रहेगी।
फेसबुक के जरिए ही जानकारी मिलने पर अध्ययन के लिए एक-दूसरे के देश में जाने वाले छात्रों की भी मदद की जाएगी। स्वीडन के दौरे पर गए प्रो. मिश्रा ने फोन पर बताया कि मुलाकात के दौरान प्रो. मार्क को काशी में बने भगवान राम, हनुमान, रावण समेत देवताओं के मुखौटे भी भेंट किए।
प्रो. कार्ट्स का काशी से है पुराना रिश्ता
प्रो. मार्क कार्ट्स पहली बार 1977 में काशी आए थे। यहां उनकी मुलाकात संकटमोचन मंदिर के दिवंगत महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र से हुई थी। उन्होंने संकटमोचन फाउंडेशन के साथ मिलकर गंगा निर्मलीकरण के लिए काम भी किया। फाउंडेशन के साथ ही 1988 में गंगा महल घाट पर कार्लस्टड विश्वविद्यालय के काशी सेंटर की शुरुआत भी की गई।
विश्वविद्यालय के 12 छात्र हर साल सर्दी की छुट्टियों में धर्म एवं संस्कृति पर अध्ययन करने यहां आते हैं। अध्ययन में संकटमोचन फाउंडेशन उनकी पूरी मदद करता है। काशी में रहने के दौरान ही प्रो. मार्क ने ‘चिल्ड्रेन ऑफ अस्सी’ नाम से किताब भी लिखी। वे बीएचयू के विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे। काशी नरेश विभूति नारायण सिंह उनके अच्छे दोस्त थे।
कार्लस्टड विश्वविद्यालय केधर्म विज्ञान एवं सामाजिक अध्ययन केंद्र में काशी की बखूबी चित्रण किया गया है। काशी के घाट, रामलीला, मंदिर समेत अनेक स्थानों की पेंटिंग बनाई है। दिवंगत काशी नरेश महाराजा विभूति नारायण की तस्वीर भी लगाई गई है।