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सवाल पुरस्कारों का नहीं, लेखकों का है

Mon, 19 Oct 2015 06:35 PM IST
रामचंद्र गुहा/जानेमाने लेखक
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जब मैंने ट्विटर पर यह देखा कि देश के वित्त मंत्री ने लेखकों पर हमला बोलते हुए एक ब्लॉग पोस्ट किया है, मैं तो हैरत में ही पड़ गया। सवाल यह है कि जब वस्तु एवं सेवा कर के मुद्दे का समाधान न हो पा रहा हो, सूखा जमीन पर कहर बन कर टूट रहा हो और मौद्रिक नीति से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल लगातार चर्चा में हों, तब ऐसी क्या आन पड़ी कि भारतीय अर्थव्यवस्था के खेवनहार को अपना समय और ऊर्जा लेखकों पर खर्च करनी पड़ रही है? फिर मैंने जेटली महोदय के ब्लॉग को पूरा पढ़ा। इससे मेरी हैरानी और बढ़ गई। हम कभी मिले तो नहीं, मगर जितना मैंने जेटली जी को देखा और सुना है, वह काफी संयमित व्यक्ति लगते हैं। मगर इस बार वह न केवल गुस्से में, बल्कि लांछन लगाने की भी मुद्रा में भी दिखे। वित्तमंत्री ने दावा किया कि साथी लेखकों की हत्या के खिलाफ लेखकों की यह एकजुटता एक 'बनावटी विद्रोह' है, जो भाजपा को लेकर एक तरह की वैचारिक असहिष्णुता को दर्शाता है। उनके मुताबिक ये लेखक लेफ्ट या कांग्रेस के हाथ की कठपुतली हैं, जो राजनीति के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं।
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अरुण जेटली की ये टिप्पणियां इन लेखकों की बौद्धिकता और वैयक्तिकता का अपमान हैं। दरअसल, साहित्यिक पुरस्कारों की वापसी की शुरुआत कर्नाटक से हुई, जहां प्रतिष्ठित लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या को रोकने में कांग्रेस सरकार की नाकामी से खफा कुछ लेखकों ने अपने राज्य साहित्यिक अकादमी पुरस्कार वापस करने का फैसला किया। जैसा कि एक कन्नड़ लेखक कहते हैं, ''बदले हुए राजनीतिक हालात में, जहां राज्य और केंद्र सरकारें कट्टरपंथी ताकतों के सामने मूक दर्शक बनी हुई हैं, लेखक, तर्कवादी और बौद्धिक लोग डर के साये में जी रहे हैं।''

इसके बाद उदय प्रकाश और नयनतारा सहगल ने अपने केंद्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा दिए। इन लेखकों की प्रतिष्ठा और इनको मिल रही मीडिया कवरेज ने देश के दूसरे लेखकों को भी अपने केंद्रीय और राज्य पुरस्कार लौटाने के लिए प्रेरित किया। मगर ये सारी प्रतिक्रियाएं बिल्कुल स्वाभाविक थीं। इनमें बनावट जैसा कुछ भी नहीं था। व्यवस्थित अभियान जैसी कोई बात ही नहीं थी। ये लेखक ही थे, जिन्होंने निजी तौर पर अपने फैसले लिए।
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अपने ब्लॉग में जेटली जी ने कलबुर्गी और नरेंद्र दाभोलकर का नाम लिया, लेकिन वह गोविंद पनसरे का नाम लेना भूल गए। मुझे भरोसा है कि यह भूलवश हुआ होगा। मगर यह तो ध्यान देना ही होगा कि विरोध की शुरुआत कर्नाटक से हुई, जिससे यह मानना मुश्किल है कि इसके पीछे कांग्रेस की साजिश है, जैसा कि जेटली बता रहे हैं। विरोध की इस लहर का कांग्रेस अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकती है, मगर ये लेखक निस्संदेह राजनीतिक स्तर पर अलग-अलग झुकाव रखते हैं, या फिर कोई झुकाव नहीं रखते।

मैं इनमें से कई लेखकों को जानता हूं, जो कांग्रेस पार्टी के पुराने आलोचक रहे हैं। जेटली जी के दावे के ठीक विपरीत इनमें से कई लेखक अतीत में किसी तरह की कृपा के पात्र नहीं रहे हैं। सामान्य शहरों के साधारण से घरों में ये रहते हैं। इनकी आय भी कोई निश्चित नहीं है। लुटियंस की नई दिल्ली की तुलना में इनकी दुनिया बेहद साधारण है।

इन लेखकों पर पेशे से जुड़े फायदा कमाने की मंशा होने का आरोप लगाना तो ठीक नहीं होगा। मगर इनमें से कुछ पर शायद अनियमित होने का आरोप जरूर लग सकता है। 1989 में जब राजीव गांधी ने सलमान रश्दी के उपन्यास 'सटैनिक वर्सेज' पर प्रतिबंध लगाया, तब स्वतंत्र सोच वाले उस साहसी शख्स धर्म कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा, 'एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में ईश-निंदा को खुद में एक संज्ञानात्मक अपराध नहीं होना चाहिए। भारत के राष्ट्रपति के लिए सभी मत एक समान होने चाहिए।' अफसोस की बात है कि उस वक्त इस प्रतिबंध की निंदा के लिए बहुत ज्यादा बुद्धिजीवी सामने नहीं आए थे। कुछ वर्ष पहले जब पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने तस्लीमा नसरीन की किताबों पर प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें राज्य से निर्वासित करने का फैसला किया था, तब स्वतंत्र सोच रखने वाले बहुत कम लोगों (इनमें वामपंथियों की तादाद तो और भी कम थी) ने सार्वजनिक तौर पर अपना विरोध प्रकट किया था। बस यहीं से दक्षिणपंथी नेताओं को देश के विभिन्न हिस्सों में लेखकों और कलाकारों को भयभीत करने का मौका मिल गया।

इसी वर्ष जनवरी में लिखे एक लेख में मैंने बताया था कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे कोई नए नहीं हैं। तमाम स्रोतों से इनकी उत्पत्ति होती रही है, मसलन, औपनिवेशिक कानून, न्यायपालिका की कमजोरियां, पुलिस का भ्रष्टाचार, विभिन्न पार्टियों के नेताओं की कायरता और प्रकाशकों व मीडिया हाउसों की मिली-भगत। मगर निशाना बनाकर लेखको की हत्या किया जाना, कुछ ऐसा है, जो अब तक नहीं हुआ था। पहले किताबों पर प्रतिबंध लगते थे, कला प्रदर्शनियों में तोड़-फोड़ होती थी और फिल्में सेंसर की जाती थीं। मगर अब लेखकों की हत्याएं महज इसलिए हो रही हैं, कि उन्होंने वह बोलने की जुर्रत की, जो वह महसूस करते हैं।

महाराष्ट्र में जब दाभोलकर की हत्या हुई, तब केंद्र व राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार थी। कर्नाटक में कल्बुर्गी की हत्या के वक्त राज्य में कांग्रेस और केंद्र में भाजपा की सरकार थी। महाराष्ट्र में पनसरे की हत्या के समय केंद्र व राज्य दोनों में भाजपा सत्ता में थी। इन तीनों हत्याओं में एक बात समान थी, कि तीनों ही लेखक पिछले काफी समय से दक्षिणपंथी हिंदू समूहों के निशाने पर थे। ऐसी घटनाएं भारत की हालत बांग्लादेश सरीखी दिखा रही हैं, जहां स्वतंत्र सोच वाले बहुत से लेखक इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मारे जा चुके हैं।

ऐसी जघन्य हत्याएं ही वर्तमान विरोध की मूल वजह हैं। गौरतलब है कि जिन लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस नहीं किए हैं, वे भी अपने चारों ओर बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। यह असहिष्णुता न केवल लेखकों, बल्कि सामान्य नागरिकों के खिलाफ भी दिख रही है।

अपने ब्लॉग में जेटली जी अतीत में हुई निरंकुशता की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि इनमें से कितने लेखकों ने आपातकाल के दौरान श्रीमती इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाई थी। दरअसल, ऐसे सवालों के चार जवाब हैं, जो एक-दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। पहला, इनमें से कुछ लेखक तो पैदा ही आपातकाल के बाद हुए थे। दूसरा, इनमें से तमाम लेखक ऐसे हैं, जिन्होंने बेहद साहस के साथ आपातकाल का विरोध किया था, और उसकी कीमत भी अदा की थी। जेटली जी को मालूम होना चाहिए कि नयनतारा सहगल ने इंदिरा गांधी की निरंकुशता की कड़ी आलोचना की थी। वह जय प्रकाश नारायण के 'एवरीमेंस वीकली' जर्नल में लगातार लिखती भी थीं। इसी वजह से उनके पति को इंदिरा गांधी के कोप का भाजन भी बनना पड़ा था। तीसरा, जगमोहन और मेनका गांधी जैसे नेताओं का अपनी कैबिनेट में साथ पाने के बाद अरुण जेटली का आपातकाल को लेकर विरोध हल्का लगता है। चौथा, आपातकाल के हालात को खुद अनुभव करने वाले अरुण जेटली को तो आज कानून के शासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में बोलने वालों के प्रति और सहानुभूति से काम लेना चाहिए।

कुछ दिन पहले बंगलूरू में युवा विद्यार्थियों का एक दल मुझसे मिला। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं जिस तरह से भाजपा, कांग्रेस और देश के प्रधानमंत्री रही शख्सियतों की सार्वजनिक आलोचना करता हूं, उससे क्या मेरा परिवार मेरी सुरक्षा को लेकर खौफजदा रहता है। मैंने उन्हें बताया कि कभी-कभी ऐसा होता है, मगर सच यह है कि अंग्रेजी लेखकों की तुलना में क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों पर जोखिम ज्यादा रहता है। यह महज संयोग नहीं है कि दाभोलकर, पनसरे और कल्बुर्गी अपनी मातृभाषा में लिखते थे। यह भी संयोग नहीं कहा जा सकता कि पुरस्कार लौटाने वालों में से ज्यादातर वे हैं, जो अंग्रेजी में नहीं लिखते। इन पंजाबी और हिंदी कवियों, मलयालम और कन्नड़ अनुवादकों पर जेटली जी ने कुछ नहीं बोला। मगर अफसोस इस बात का है कि यही लेखक, ऐसे विरोधियों और हत्यारों द्वारा निशाने पर लिए जाते हैं, जो व्यापक संघ परिवार से कुछ नाता रखते हैं, श्रीमान जेटली भी जिसके सदस्य हैं।
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