किसी पद के लिए दावेदार का ऐलान करना हो, तो भाजपा को पहले से पसीना आने लगता है। वजह साफ है। प्रधानमंत्री का पद हो या किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दावेदार चुनने का, पार्टी अंदरूनी झगड़ों से त्रस्त रहती है।
भाजपा आगामी विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव में इन बड़ी-बड़ी कुर्सियों तक पहुंच पाएगी या नहीं, यह सिर्फ वोटर की अंगुली बता सकती है। लेकिन एक बात साफ है कि पार्टी इन दिनों बगावत और विरोध के आगे झुकने को तैयार नहीं।
पहले पीएम पद के दावेदार के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम पर मुहर और अब दिल्ली में सीएम कुर्सी के लिए विजय गोयल को पीछे सरकाते हुए डॉ. हर्षवर्धन के नाम को हरी झंडी दिखाना, इसी का सबूत है।
राजनाथ सिंह की चुनौतियां?
और भाजपा के इस कड़े रुख के पीछे हैं पार्टी अध्यक्ष ठाकुर राजनाथ सिंह। नितिन गडकरी की छुट्टी के बाद जब उन्होंने यह कांटों भरा ताज पहना, तो सामने चुनौतियों की कमी नहीं थी।
भाजपा में किसी भी फैसले को अमली जामा पहनाने तक लेकर जाना भी कम मुश्किल नहीं है। लेकिन राजनाथ सिंह इस बार झुकने के मूड में नहीं दिख रहे।
सबसे पहले बात नरेंद्र मोदी की। गोवा में हुई भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाने का फैसला हुआ और इसे लेकर घोषणा की तैयारियां कर ली गईं।
मोदी पर अडिग रहे राजनाथ
लेकिन फिर वही, जो अकसर भाजपा में होता है। बगावत। आडवाणी खेमे ने इस फैसले का विरोध किया और उनकी सिपहसालार सुषमा स्वराज शुरुआत में इस बैठक में पहुंची भी नहीं।
हालांकि, बाद में वह राजनाथ सिंह के बुलाने पर आईं और मुस्कराते हुए तस्वीरें भी खिंचवाई। तय कार्यक्रम के मुताबिक मोदी के नाम का ऐलान हुआ, भले नाराजगी ओढ़ने वाले आडवाणी वहां न पहुंचे हों।
दूसरी बार का किस्सा भी मोदी से जुड़ा है। इस बार उन्हें पीएम पद का दावेदार बनाए जाने की बात थी। सो, आडवाणी फिर रूस गए। यहां तक कि दिल्ली में मौजूद होते हुए भी वह कार्यक्रम में नहीं पहुंचे।
आडवाणी खेमा इस बात का विरोध कर रहा था कि विधानसभा चुनावों से पहले मोदी के नाम का ऐलान न किया जाए। लेकिन 'मोदी लहर' पर भरोसा दिखाने वाले राजनाथ नहीं झुके और मोदी के नाम की घोषणा कर दी गई।
अब दिल्ली चुनाव की बारी
लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें चिट्ठी लिखकर नाराजगी जताई, लेकिन उन्होंने साफ किया कि वह हमारी पार्टी के बुजुर्ग हैं और उनकी सारी शिकायतें दूर की जाएंगी। कुछ दिनों बाद मोदी और आडवाणी एक मंच पर दिखे और नाराजगी घटती दिखी।
तीसरा वाकया दिल्ली विधानसभा चुनावों से जुड़ा है। बुधवार को पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल के रुतबे और उनके कार्यकर्ताओं की नाराजगी को कोई अहमियत न देते हुए आखिरकार डॉ. हर्षवर्धन की साफ छवि पर दांव लगाने का फैसला किया।
भाजपा में हर्षवर्धन का नाम शुरू से सामने नहीं था। यहां तक कि जब पहली बार उनके नाम की चर्चा सीएम के दावेदार के रूप में हुई, तो विजय गोयल के समर्थकों ने खूब हो-हल्ला मचाया।
वास्तव में बंद कमरों में विजय गोयल ने भी इस फैसले पर नाराजगी जताई। लेकिन राजनाथ फिर नहीं माने। वरिष्ठ नेताओं को भरोसे में लेते हुए उन्होंने हर्षवर्धन से जुड़े फायदों को सामने रखा और आखिरकार इसका ऐलान भी हो गया।