राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है जिसमें कोर्ट ने संथारा को आत्महत्या का प्रयास करार देते हुए इस पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे। हाईकोर्ट ने कहा कि यह धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) का उल्लंघन है जो एक आपराधिक मामला है।
अगस्त महीने की 10 तारीख को इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि संथारा करने वाले व्यक्ति को आत्महत्या के प्रयास का दोषी माना जाएगा। कोर्ट ने संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत इस प्रथा को जैन धर्म का गैरजरूरी धार्मिक कार्यक्रम करार देते हुए इसे मानने से भी इंकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार किसी भी तरीके से संथारा करने का प्रयास करने वाले लोगों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए। इस संबंध में अगर कोई शिकायत आती है तो उस पर आत्महत्या के प्रयास की धारा 309 के तहत आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए।
हाईकोर्ट के इस निर्णय को धवल जीवन मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है जिसमें उन्होंने संथारा को जैन धर्म का एक प्रमुख अंग मानते हुए अपने आधार के तौर पर पेश किया है। गौरतलब है कि सदियों से चली आ रही यह परंपरा उस वक्त चर्चा में आई जब 2006 में जयपुर की 93 साल की बुजुर्ग महिला कीला देवी हिरावत संथारा पर बैठी। उनके इस कदम ने एक नई बहस को जन्म दिया और कुछ लोग कहने लगे की संथारा का आधुनिक समय में कोई स्थान नहीं है।
क्या है संथारा?
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर लंबे समय से विवाद चलता आया है। किसी धर्म ग्रंथ में इसे सही ठहराया गया है तो किसी अन्य में गलत। हमारा भारतीय संविधान भी इसे अलग नजरिए से देखता है जिसके मुताबिक इच्छामृत्यु अपराध की श्रेणी में आता है। एक इसी तरह का विवाद जैन धर्म में इच्छामृत्यु के लिए अपनाए जाने वाले तरीके जिसे 'संथारा' के नाम से जाना जाता है, को लेकर हाल के दिनों में शुरु हुआ है।
जीवन के अंतिम समय में या किसी असाध्य संकट के स्थिति में जिसमें जान जाने की पूरी संभावना है हो ऐसे समय में आहार का त्याग करके आने वाली मृत्यु की प्रतीक्षा करने की प्रक्रिया को 'संथारा' के नाम से जाना जाता है। संथारा में जो शरीर त्याग किया जाता है उसके पीछे शरीर से उत्पन्न होने कष्टों से बचने का भाव नहीं रहता। मूलतः राजस्थान और गुजरात में इस प्रथा का प्रचलन ज्यादा है। संथारा एक ऐसा प्रयोग है जिसमें व्यक्ति इच्छामृत्यु के लिए उपवास पर बैठ जाता है और अंतिम सांस तक अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करता।
जैनधर्म में संथारा की प्रथा प्राचीन काल से लेकर आज तक लगातार चलती आ रही है। यह इच्छा मृत्यु पाने की ऐसी परंपरा है जिसे महोत्सव से रूप में मनाया जाता है। जैन परंपरा में इसे कई दूसरे नामों से भी जाना जाता है जिनमें से संलेखना, समाधिमरण, संन्यासमरण, मृत्युमहोत्सव, सकाममरण, उद्युक्तमरण, अंतक्रिया आदि प्रमुख है।
कब और कौन कर सकता है संथारा?
लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि आखिर संथारा कौन और कब कर सकता है। जैन धर्म के अनुसार संयमशील, सकाम, अपनी इंद्रियों पर वश रखने वाला और मृत्यु से भयभीत न होने वाला व्यक्ति संथारा लेने योग्य होता है। इसे किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित, बुजुर्ग या फिर जिसका इस दुनिया से मन उब गया हो वह संथारा ले सकता है।
संथारा लेने की प्रक्रिया में आहार का त्याग करने के अलावा कुछ अन्य त्याग भी करने पड़ते हैं। इसमें सबसे पहले साधक को एक शांत स्थान की खोज करनी पड़ती है जहां वह इस अभ्यास को आसानी से कर सके। इसके लिए जंगल या फिर कोई निर्जन स्थान सबसे उपर्युक्त होता है। रेंगने वाले जानवर जैसे चींटी, सांप और आकाश में उड़ने वाले जंतु जैसे चील, कौवे, गिद्ध आदि उसके शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं तो भी उसे विचलित नहीं होना होता।
संथारा लेने वाले व्यक्ति को जिंदगी और मौत के बारे में भी नहीं सोचना होता। इस तरह वह बिना किसी काम भावना के अपने मौत का इंतजार करता है और जब मौत आती है तो उसे सहजता से स्वीकार करता है।