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'बेचारी' सोनिया और 'मार्केट से गायब' राहुल

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हाथी मर जाए, तब भी उसकी कीमत नौ लाख होती है। ऊंट की चोरी ‘निहुरे-निहुरे’ नहीं होती।
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चोर भले छिप जाए, ऊंट की पीठ दिख जाती है। घायल हो तो भी, शेर आखिर शेर होता है।

ये मुहावरे किसने और कब गढ़े, पता नहीं। लेकिन आज की तारीख में, और खासकर कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में, लगता है कि इन मुहावरों के रचनाकार को सियासत की गहरी समझ थी।

अद्भुत दूरदर्शिता थी कि वे सैकड़ों साल बाद न केवल पुराने नहीं पड़े, बल्कि नए अर्थ लेकर सामने आ गए हैं। इन मुहावरों की सप्रसंग व्याख्या की कोई जरूरत नहीं है।
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उनके अर्थ स्पष्ट हैं। पर थोड़ा अर्थ-विस्तार शायद उनका मतलब कुछ और साफ कर दे। इस मकसद से तुरत-फुरत की तीन टिप्पणियां।

महावत जिम्मेदार?

हाथी कांग्रेस: कांग्रेस पार्टी के भीमकाय जईफ हाथी होने में किसी को संदेह नहीं है। पिछले साल के लोकसभा चुनाव में उसके पस्त होने की तस्वीरें अभी ताजा हैं।

साल 2014 के आम चुनाव से पहले और उसके बाद के विधानसभा चुनावों ने भी घुटनों के बल उसके बैठ जाने की पुष्टि की है। मुहावरे से इतर, फर्क इतना है कि हाथी मरा नहीं है इसलिए कोई उसकी ठीक-ठीक कीमत लगाने की स्थिति में नहीं है।

कुछ उसके मरने की प्रतीक्षा में हैं तो कुछ सक्रिय रूप से इस प्रयास में कि मृत्यु की प्रक्रिया, जितना संभव हो, तेज हो जाए। महावत-पीलवान भी इसमें शामिल हैं।

ऊंट कांग्रेस: पूर्व केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल और दस जनपथ के भरोसेमंद हंसराज भारद्वाज इस सिलसिले की ताजा कड़ी हैं।

छिपते-छिपाते, बचते-बचाते ऊंट चुराने की कोशिशें हुई हैं। भारद्वाज की बगावत में छिपकर रहने का प्रयास साफ है, कि चोरी हो और पता भी न चले, ताकि आगे का रास्ता पूरी तरह बंद न हो जाए।

प्रियंका को रोकने की कोशिश?

भारद्वाज ने कांग्रेस की वर्तमान दशा के लिए सोनिया और राहुल गांधी को दोषी मानने से इनकार कर दिया। लेकिन कहा कि चाटुकारों से घिरी सोनिया ‘बेचारी’ हैं और राहुल तो ‘मार्केट’ में हैं ही नहीं।

यह भी कहा कि रॉबर्ट वाड्रा का मामला प्रियंका गांधी का राजनीति में प्रवेश रोकने के लिए उठाया जा रहा है। प्रियंका सक्रिय राजनीति में होतीं तो स्थितियां अलग होतीं।

कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व पर इससे पहले भी सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि लोग पार्टी से ऊब गए हैं, उसे सुनना नहीं चाहते। ऐसे में उसका उबरना मुश्किल है।

इसके बावजूद, किसी ने कांग्रेस के फिर उठ खड़ा होने की संभावना को खारिज नहीं किया। सब मरणासन्न हाथी की प्रदक्षिणा करते रहे। ऊंट चुराने की कोशिश की भी तो निहुरे-निहुरे। एक खिड़की हर हाल में खुली रखी।

इकबाल बुलंद रहना चाहिए!

शेर कांग्रेस: पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि कांग्रेस की असल मुश्किल यह है कि घायल शेर आक्रामक होना तो दूर, दहाड़ना भी भूल गया है।

चुनाव नतीजों और अंदरूनी आलोचनाओं ने उसका ‘इकबाल’ प्रभावित किया है। इसकी बहाली की संभावनाएं राहुल गांधी में तलाश की जा रही हैं क्योंकि सरकारों की तरह बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी अंततः इकबाल से चलती हैं। इकबाल की बुलंदी जरूरी है।

यह पूछने पर कि क्या राहुल गांधी में इकबाल बहाली की क्षमता नजर आती है, पार्टी के एक नेता ने कहा, "खौफ तो मिट्टी के शेर का भी होता है।"

राजनीतिक परिदृश्य इस समय पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ दिखता है। लेकिन यह कहना ठीक नहीं होगा कि इसकी पूरी जिम्मेदारी दूसरों की ही है। इस आलोचना को खारिज नहीं किया जा सकता कि पार्टी की इस हालत का जिम्मेदार उसका नेतृत्व ही है।
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पूंछ भी नहीं हिलाता शेर?

वैसे, घायल शेर की एक कहानी और भी है। किसी शिकार में गहरी चोट के बाद शेर चुपचाप पेड़ के नीचे बैठा था। घाव पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। लेकिन शेर हिलडुल नहीं रहा था।

तभी एक गधा उधर से गुजरा। उसने शेर से कहा कि आप घायल हैं, पर मक्खियां तो उड़ा सकते हैं। पूंछ हिलाने भर की बात है।

शेर ने हिकारत से गधे को देखा और बोला- तुम जो हो, वही रहो। मैं मक्खियां उड़ाऊंगा तो नई मक्खियां आ जाएंगी, नए सिरे से खून चाटने। पुराने चाटुकार ही ठीक हैं।

पुराने वालों में थोड़ा खौफ, थोड़ा अदब है। पेट भी भरा हुआ है। मुझे उनसे कोई परेशानी नहीं है।
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