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फैसलों पर राहुल से ली जाती है मंजूरी

Sun, 26 Jan 2014 08:24 AM IST
धीरज कनोजिया/अमर उजाला, दिल्ली
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जनवरी 2013 में कांग्रेस उपाध्यक्ष की कुर्सी संभालने के साथ ही राहुल गांधी की पार्टी में जिम्मेदारी बढ़ गई थी।
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राहुल पार्टी पदाधिकारियों की बैठक लेने लगे। उनको पार्टी गतिविधियों की रिपोर्ट दी जाने लगी और हर फैसले पर उनकी राय ली जाने लगी।

17 जनवरी 2014 को चुनाव अभियान की अगुवाई मिलते ही उन्होंने कांग्रेस की कमान पूरी तरह से संभाल ली।

अभी तक पार्टी के हर छोटे बड़े फैसले में औपचारिक रूप से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मंजूरी ली जाती थी लेकिन अब आधिकारिक रूप से राहुल की मंजूरी ली जा रही है, वह भी बाकायदा लिखित रूप से। अभी तक वह सलाह देते थे।

राहुल का बढ़ा कद

लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी के अंदर फेरबदल के तेजी से फैसले लिए जा रहे हैं। हर फैसले में सोनिया की भूमिका कम और राहुल का रोल बढ़ता जा रहा है।

15 लोकसभा सीटों पर आंतरिक चुनाव के जरिए उम्मीदवारों के चयन की बात हो या फिर इतनी जल्द स्क्रीनिंग कमेटी का गठन कर उम्मीदवारों का ऐलान करने का फैसला। राहुल के ये अपने फैसले हैं।

राहुल की सक्रियता इसी बात से साबित होती है कि कई केंद्रीय मंत्री लंबे समय से सोनिया गांधी से मिले ही नहीं है। उनका काम राहुल से मुलाकात करने से ही पूरा हो जाता है।

राहुल के ही नेतृत्व में चुनाव लड़ने की मांग

21 जनवरी को कांग्रेस प्रवक्ता और मीडिया पैनल के सदस्यों की सूची का विस्तार किया गया। इससे संबंधित प्रेस रिलीज में लिखा गया कि सोनिया और राहुल दोनों ने प्रवक्ताओं की सूची के नाम को मंजूरी दी है।

अब नियमित रूप से इस कसरत को मूर्त रूप दिया जा रहा है। प्रदेश कांग्रेस संगठनों के रहनुमाओं के फेरबदल में राहुल का ही फैसला मायने रख रहा है।

राजस्थान और मध्य प्रदेश के बाद हरियाणा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में भी राहुल की युवा बिग्रेड के सदस्यों का होना तय माना जा रहा है।

कांग्रेस प्रवक्ता और पहाड़ी राज्यों के स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष पी सी चाको कहते है कि राहुल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा रहा है तो स्वाभाविक है कि हर फैसला उनका होगा।

सोनिया से मुलाकातों का दौर हुआ कम

कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका कम होने के सवाल को खारिज करते हुए चाको कहते है कि राहुल के सक्रिय होने का मतलब ये नहीं है कि सोनिया सक्रिय नहीं है। दोनों नेताओं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा।

राहुल की सक्रियता के चलते कांग्रेस नेताओं की उनसे मुलाकातें बढ़ गई हैं, जबकि सोनिया से अब चुनिंदा और पुराने नेता ही मिल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश कोटे के कई मंत्रियों ने तो दबी जुबान में माना कि वह पिछले दो-तीन साल से सोनिया गांधी से बमुश्किल ही मिले हैं, जबकि राहुल से कई बार मुलाकात हो चुकी है। इससे उनके राजनीतिक करियर को नुकसान नहीं फायदा ही पहुंचा है।
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बुजुर्ग नेताओं के लिए खतरे की घंटी

राहुल की बढ़ती सक्रियता को पार्टी के अंदर विश्लेषण करने वाले नेताओं का अपना तर्क है।

कई इस सक्रियता को बुजुर्ग नेताओं के लिए खतरे की घंटी मान रहे हैं। जबकि कई नेता कहते हैं कि राहुल 2014 चुनाव के बाद ही कांग्रेस में बड़े फेरबदल की बात करते रहे हैं।

इससे साफ है कि वह पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को अभी पार्टी से बाहर का दरवाजा दिखाना नहीं चाहते।

हालांकि राहुल का असर यह है कि आगामी लोकसभा चुनाव में कई बड़े और राज्यसभा के दरवाजे से मंत्री बनने वाले नेताओं को चुनाव लड़ना पड़ सकता है।

इनमें गुलाम नबी आजाद, जयराम रमेश, अंबिका सोनी, एसएम कृष्णा, दिग्विजय सिंह, बी के हरिप्रसाद, सत्यव्रत चतुर्वेदी, मणि शंकर अय्यर समेत कई नाम चर्चा में हैं।
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