लंबी छुट्टी के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आखिरकर वापस लौट आए हैं। राहुल पर होने वाली बहस, कानाफूसी और चर्चा परिचर्चाओं का रुख अब 'राहुल कब लौटेंगे', 'नेतृत्व संभालेंगे' जैसे सवालों से हटकर 'क्या वो कर पाएंगे' के सवाल पर आकर रुक गया है। कांग्रेस के लिए एक असहज सी स्थिति ये है कि राहुल पर ये चर्चा अब उनके प्रति अविश्वास मत में तब्दील होती दिख रही है।
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आलोचना के ताजा सुर कैप्टन अमरिंदर सिंह और शीला दीक्षित ने छेड़े हैं। दोनों कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हैं और पार्टी सर्किल में इनकी बात सुनी भी जाती है। इन दोनों नेताओं का मूल तर्क राहुल के नेतृत्व को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
अगर कांग्रेस मुख्यालय, 24 अकबर रोड के इर्द गिर्द मौजूद पार्टी के 150 वरिष्ठ नेताओं और कई राज्यों की इकाईयों में भी चल रही इस तरह की कानाफूसी पर ध्यान दिया जाए तो स्थिती और उलझी हुई नजर आती है।
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आखिर राहुल के नेतृत्व को लेकर कांग्रेसी नेताओं की कंपकपी को बंध रही है। उनकी अनुभवहीनता कोई मसला नहीं है, क्योंकि संजय गांधी और राजीव गांधी ने भी ज्यादा राजनीति नहीं देखी थीं। कांग्रेस में कई लोग उस योजना को लेकर परेशान हैं, जिसके तहत राहुल गांधी पार्टी को अपने पसंदीदा आकार में ढालने के लिए अंजाम दे सकते हैं।
राहुल की कमान
पार्टी के भीतर रसूख़ रखने वाले लोग भी उदास होकर कुबूल करते रहे हैं कि अब उन्हें समझ में आ गया कि आख़िर क्यों राहुल ने 2004 में राजनीति में आने के बाद से ही संगठन से 'दूरी' बना रखी थी। वो कहते हैं कि, ये इसलिए था कि जब वक्त आए तो राहुल का 'सफाई अभियान' चलाना आसान हो।
पार्टी के भीतर ये भावना है कि राहुल की कमान में केवल दो तरह के नेता ही सफल हो सकेंगे। पहले वे जो चुनाव जीतने का माद्दा रखते हैं और दूसरे टेक्नोक्रेट कहे जाने वाले प्रोफेशनल बौद्धिक लोग।
जनवरी, 2014 में जयपुर में दिए गए भाषण के हर शब्द को राहुल अगर लागू करने लगें तो बड़ी तादाद में ऐसे 'जनाधार विहीन चेहरे' अपनी जगह खो देंगे, जो पार्टी में जगह पाने के लिए वफ़ादारी और खुशामद का सहारा लेते हैं।
'मिस्टर क्लीन'
राहुल के लिए इस 'सफाई अभियान' का मतलब एक ऐसे अधूरे एजेंडे को पूरा करना है जो उन्होंने राजीव गांधी से विरासत में पाया है। 1985 में कांग्रेस के सौ साल पूरे होने पर 41 वर्षीय राजीव गांधी ने मुंबई के ब्रैबोर्न स्टेडियम में मौजूद भीड़ के सामने पार्टी में पॉवर ब्रोकर्स पर हमला बोला था। तब तक 'मिस्टर क्लीन' वाली उनकी छवि बेदाग बनी हुई थी।
राजीव गांधी ने कांग्रेस के सफाई अभियान के लिए अर्जुन सिंह को उपाध्यक्ष के तौर पर चुना, लेकिन इसके वैसे नतीजे नहीं निकले जैसा राजीव चाहते थे।
ऐसा नहीं है कि मौजूदा कांग्रेस में ऐसे नेताओं की कोई कमी है जो राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस को हर चुनावी क़ामयाबी पाते हुए देखना चाहते हैं, लेकिन वो ये भी चाहते हैं कि राहुल पार्टी के सफाई अभियान की कोशिशों में सफल न हों।
राहुल की योजना
वे राहुल को 'सबके लिए फैसला' लेते हुए देखना नहीं चाहते, जैसा कि राहुल ने जनवरी 2014 में जयपुर में वादा किया था। बल्कि वे राहुल को पहचान की राजनीति के पैरोकार के तौर पर देखना चाहते हैं जो 'प्रतिभाओं' को उनकी जाति, उपजाति और धर्म के आधार पर प्रोत्साहन दें।
हालांकि राहुल की टीम के बारे में माना जा रहा है कि वे ऐसी योजना पर काम कर रहे हैं जिसमें काम करने वाले लोगों के लिए आगे बढ़ने का अवसर हो। जेएनयू में तब पीएचडी कर रहे मैथ्यू कुझालानंदन ने कुछ साल पहले कांग्रेस की विचारधारा और पार्टी घोषणापत्र को लेकर राहुल से मुलाकात की थी।
राहुल ने उनके सवालों के जवाब की बजाय गरीबी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और धमाकों के बारे में पूछ लिया। कुझालानंदन ने कहा, "मैं हैरान था। लेकिन यह एक ऐसा मौका था, जिसने मुझे राहुल की दुनिया के बारे में समझ और उनके सोचने के तरीके को समझने में काफी मदद की।"
कांग्रेस पार्टी का एक छोटा सा तबका इस बात को लेकर हैरत में है कि क्या राहुल इन आवाज़ों के बावजूद सोच समझ कर अपनी वापसी में देर कर रहे हैं।
सत्ता के केंद्र
आखिरकार कांग्रेस प्रमुख के तौर पर वे पहले ही दिन खुद को नासमझ के तौर पर देखा जाना पसंद नहीं करेंगे। दूसरी बात ये कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में बने रहने की मांग भी उतनी ही परेशान करने वाली है। राहुल और उनकी टीम को ये बात पता है कि सत्ता के दो केंद्र होने की सूरत में जिम्मेदारी तय करना पूरी तरह से नामुमकिन हो जाएगा और इसका उन्हें अनुभव है भी।
2006 में पार्टी महासचिव बनने के बाद से ही राहुल और उनकी टीम को इन सब बातों का व्यावहारिक अनुभव हो चुका है कि अगर सत्ता के दो केंद्र हैं तो जमीनी स्तर पर जवाबदेही का मसला हल करना नामुमकिन जैसा है।
हालांकि मां-बेटे के बीच गहरा जुड़ाव है, लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सोनिया के वफ़ादारों और राहुल टीम के लोगों के बीच बुरी तरह से बंटा हुआ है। सोनिया पहले ही पार्टी के शीर्ष नेताओं को ये जता चुकी हैं कि वे 2020 तक कांग्रेस प्रमुख बने रहने को लेकर 'बिलकुल इच्छुक' नहीं हैं। कांग्रेस का संविधान पार्टी अध्यक्ष को पांच साल का कार्यकाल देता है। इन्हीं समीकरणों की वजहों से राहुल पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
हालांकि मां-बेटे के बीच गहरा जुड़ाव है, लेकिन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सोनिया के वफ़ादारों और राहुल टीम के लोगों के बीच बुरी तरह से बंटा हुआ है। सोनिया पहले ही पार्टी के शीर्ष नेताओं को ये जता चुकी हैं कि वे 2020 तक कांग्रेस प्रमुख बने रहने को लेकर 'बिलकुल इच्छुक' नहीं हैं। कांग्रेस का संविधान पार्टी अध्यक्ष को पांच साल का कार्यकाल देता है। इन्हीं समीकरणों की वजहों से राहुल पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।