लगता है कि चुनावी तैयारी में जुट चुके माननीय अब संसद में मंत्रियों से सवाल पूछने के मूड में नहीं हैं।
मानसून सत्र के दौरान खासतौर पर लोकसभा की बैठकों के नतीजों से तो ऐसा ही लगता है, क्योंकि इस दौरान सदन में मात्र एक दिन ही प्रश्नकाल हो पाया। इससे मंत्रियों की मौज रही।
संसद का आकलन है कि सदन में पूछे जाने वाले एक सवाल का जवाब तैयार करने में लगभग 21 हजार रुपए का खर्च आता है।
मानसून सत्र की अवधि को पांच दिन के लिए बढ़ा दिया गया है, लेकिन इन बढ़ी अवधि में प्रश्नकाल नहीं होगा, क्योंकि प्रश्न पूछने की प्रक्रिया 21 दिन पहले शुरू हो जाती है। सत्र की अब तक मात्र 16 बैठकें हुई हैं और लोकसभा की ज्यादातर बैठकें हंगामे की भेंट चढ़ चुकी हैं।
लोकसभा में सांसद मात्र एक दिन ही मंत्रियों से सवाल पूछ पाए। इस मामले में राज्यसभा का प्रदर्शन कुछ बेहतर रहा है। उधर, संसद में प्रश्नकाल के नहीं होने से मंत्री भी निश्चिंत दिखे, क्योंकि उन्हें प्रश्नकाल के दौरान सांसदों के तीखे सवालों से रूबरू नहीं होना पड़ा।
दरअसल, संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही प्रश्नकाल से ही शुरू होती है। इसके लिए एक घंटा का समय तय होता है। प्रत्येक मंत्रालय के सवाल पूछने का दिन भी तय है।
हर दिन 20 मौखिक सवाल व उन पर कुछ पूरक सवाल पूछने का प्रावधान है। सांसदों को तीन हफ्ते पहले लिखित में सवाल भेजने होते हैं। लॉटरी के माध्यम से मौखिक सवालों का चयन होता है।
इसके बाद संबंधित मंत्रालय उनका जवाब तैयार करते हैं। बाकी सवालों का जवाब सांसद को लिखित में भेज दिया जाता है। मंत्रियों को मौखिक सवालों का जवाब देने के लिए बाकायदा तैयारी करनी होती है।
मंत्रालय के आला अफसर उन्हें एक दिन पहले पूरी जानकारी दे देते हैं, लेकिन हंगामे के चलते मंत्रियों को लोकसभा में मात्र एक दिन ही जवाब देने पड़े।