मोदी मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को कैबिनेट मंत्री बनाकर अहम जिम्मेदारी दी गई है।
59 वर्षीय पर्रिकर शायद आईआईटी से पढ़े भारत के किसी राज्य के पहले मुख्यमंत्री हैं और शायद देश के पहले टेक्नोक्रेट रक्षा मंत्री भी बनने जा रहे हैं। ये रहीं पर्रिकर की सात खास बातें-
1- पहनावे और बर्ताव की कसौटी पर देखा जाए तो पर्रिकर मध्य वर्ग के आदर्श चेहरे की तरह जान पड़ते हैं। बाहर निकली हुई कमीज, सैंडल, आम आदमी की ज़ुबान में होने वाले भाषण और कई बार उनका भावुक हो जाना, ये सब बातें उन्हें दूसरे नेताओं से अलग बनाती हैं।
2- मिस्टर क्लीन की छवि उन्होंने राजनीति में आने के वक्त से ही बना रखी है लेकिन चुनावों के दौरान चंदा जुटाने की उनकी काबलियत की भी तारीफ की जाती है।
मोदी की ही तरह करते हैं काम
3- पर्रिकर को एक काम करने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है। कहा जाता है कि वह रोज 18 घंटे काम करते हैं। हर फाइल बारीक़ी से देखते हैं और उनके निर्देश स्पष्ट होते हैं। सियासी हलकों में उन्हें एक काबिल प्रशासक के तौर पर देखा जाता है।
4- उनके करीबी कहते हैं कि वह हर मुद्दे पर मुकम्मल जानकारी रखते हैं और सबसे बेहतर समाधान का रास्ता चुनने की कोशिश करते हैं।
5- पर्रिकर को ऐसे शख्स के तौर पर नहीं जाना जाता है जो अलोकप्रिय फैसले लेने से हिचकता हो। हालांकि हाल के दिनों में जुआ घरों को बंद करने, सौ दिन के भीतर लोकायुक्त के गठन और करोड़ों रुपये के खनन घोटाले में शामिल नेताओं को गिरफ्तार करने के मामले में अपने वादों से पीछे हटता हुआ देखा गया।
6- पर्रिकर की कार्यकुशलता की छाप उनके बजट भाषणों में भी देखी जा सकती है। वह आम आदमी को तकलीफ दिए बगैर राजस्व जुटाने का गुर जानते हैं। मीडिया में होने वाली आलोचना को लेकर कई बार वे भड़क जाते हैं और इससे नए सिरे से आलोचना शुरू हो जाती है।
7- उनकी अगर सार्वजनिक तौर पर तारीफ की जाती है तो वह असहज हो जाते हैं। और यहां यह बात भी अहमियत रखती है कि पर्रिकर को संघ का भरोसा हासिल है।
किसके बाद हैं सबसे ज्यादा लोकप्रिय मुख्यमंत्री?
गोवा के पहले मुख्यमंत्री दयानंद बांडोदकर के बाद पर्रिकर को राज्य का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री कहा जाता है लेकिन तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद पर्रिकर कभी भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।
चौदह साल पहले 24 अक्तूबर 2000 को वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। तब उनके पास जनादेश नहीं था। पर्रिकर जिस सरकार की अगुवाई कर रहे थे वे कांग्रेस छोड़कर आए विधायकों की बैशाखी पर टिकी थी।
सरकार जारी रखने की बजाय पर्रिकर ने 16 महीने में ही विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी। उनके कदम ने अगले चुनावों के बाद विधानसभा में पार्टी की ताक़त 10 विधायकों से 17 कर दी।
तीन जून 2002 को पर्रिकर दोबारा राज्य के मुख्यमंत्री बने। भाजपा 17 विधायकों के साथ विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। और कांग्रेस को भाजपा से एक कम 16 सीटें मिलीं।
फरवरी 2005 में चार विधायकों के पार्टी छोड़ने से पर्रिकर को दो साल सात महीनों में ही एक बार फिर मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा।
पर्रिकर की सबसे बड़ी ताकत
लेकिन 2012 में हालात बदल गए और गोवा की राजनीति में उनकी लोकप्रियता विधानसभा में भाजपा की ताकत के तौर पर दिखने लगी।
नौ मार्च 2012 को जब पर्रिकर ने तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली थी तो ये पहला मौका था जब वे स्पष्ट बहुमत वाली किसी सरकार का नेतृत्व कर रहे थे।
40 सदस्यों वाली गोवा विधानसभा में उनकी पार्टी के 24 विधायक थे और उन्हें इसके अलावा भी छह विधायकों का समर्थन प्राप्त था। लेकिन इस दफा एक बार फिर से उन्हें मुख्यमंत्री की पद छोड़ना पड़ा, एक नई जिम्मेदारी के लिए।
इस बार मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल दो साल नौ महीने का रहा।