यमुना नदी के प्रदूषण के ‘गंभीर संकट’ से चिंतित राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने इसके किनारे ठोस कचरा और मलबा डालने पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही न्यायाधिकरण ने दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सरकारों को इस मलबे को तत्काल हटाने का निर्देश दिया है।
एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बेंच ने कहा कि यमुना नदी के किनारे मलबा डाला जा रहा है और यह यमुना नदी के जल के प्रदूषण के साथ ही पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा है। यमुना को प्रदूषित होने से रोकने को सुनिश्चित किए जाने को और इसके किनारे पड़े मलबे तथा कचरे को हटाने के लिए कुछ निर्देश दिए जाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि हम यमुना के किनारे या इसके पानी में किसी व्यक्ति, प्राधिकरण या अन्य किसी के द्वारा ठोस कचरा समेत किसी भी प्रकार का मलबा डाले जाने से रोकने के मुद्दे पर गौर कर रहे हैं।
बेंच में जस्टिस कुमार के अलावा जस्टिस ज्योतिमणि और विशेषज्ञ सदस्य डीके अग्रवाल, जीके पांडेय और एआर यूसुफ भी शामिल हैं। बेंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार, एनसीटी दिल्ली की सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण और पूर्वी दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन को यमुना नदी के किनारे पड़े मलबे को हटाने का काम तत्काल शुरू कर देना चाहिए।
इसके अलावा न्यायाधिकरण ने संबंधित प्राधिकरणों को मलबा गाजीपुर स्थित साइट पर डालने का निर्देश दिया। साथ ही न्यायाधिकरण ने मलबे को हटाने का खर्च कचरा डालने वाली कंपनियों, व्यक्तियों और एकल स्वामित्व से वसूल करने को कहा है। बेंच ने यह निर्देश मनोज मिश्रा द्वारा दायर याचिका की सुनवाई पर आया है। मिश्रा ने यमुना नदी के किनारे मलबा डाले जाने का विरोध किया था।
एनजीटी ने डीडीए के वाइस चेयरमैन, कॉरपोरेशन के कमिश्नर, पर्यावरण विभाग के सचिव, एनसीटी दिल्ली, सिंचाई विभाग के सचिव, उत्तर प्रदेश को मिलाकर एक कमेटी का भी गठन किया था। एनजीटी ने इस कमेटी उसके निर्देश के क्रियान्वयन को सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया है। एनजीटी ने उसके आदेश को लागू करने के लिए एक समय सीमा भी तय करने को कहा है।