पहले मेरा इरादा था कि जब हर तरफ 1965 का युद्ध छिड़ा हुआ है तो मैं भी कलम की तलवार पकड़ कर कूद जाऊं और दुश्मनों के कुश्तों के पुश्ते लगा दूं।
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फिर सोचा कि अभी तो 22 सितंबर तक हंगामा चलेगा, जब लोग-बाग किसकी हार, किसकी जीत के तराने गाते-गाते थक के गिर पड़ें, तब इस विषय पर लिखकर मन ठंडा करूंगा।
फिर मन में आया कि दिल्ली के औरंगज़ेब रोड को अब्दुल कलाम मार्ग से बदलने के मामले को लेकर नेताओं, बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों में जो छीछालेदर हो रही है उसमें थोड़ा-बहुत ऐतिहासिक गन मेरी ओर से भी उछल जाए तो क्या बुराई है?
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क्या है जरूरत?
लेकिन फिर ये सोचकर हाथ रोक लिया कि बड़ी बेइज्ज़ती हो जाएगी अगर किसी ने ये पूछ लिया कि मियां! औरंगजेब रोड को तो छोड़ो ये बताओ कि कराची के गांधी गार्डन को बदलकर, कराचीजुओलॉजिकल गार्डन, रामबाग़ को आरामबाग़, बलुचिस्तान के शहर हिंदूबाग़ को मुस्लिमबाग से बदलने की क्या जरूरत थी?
जब लाहौर में गंगाराम हॉस्पिटल, मेयो हॉस्पिटल, गुलाबदेवी हॉस्पिटल, केनेड गर्ल्स कॉलेज और एचिसन कॉलेज का नाम आज तक किसी को बुरा नहीं लगा तो फिर लॉरेंस गार्डन को बाग़-ए-जिन्ना, क्रिश्चयन नगर को इस्लामपुरा और संत नगर को सुन्नत नगर करके मुसलमान बनाने की क्या जरूरत थी? जब टोबाटेक सिंह में कोई ख़राबी नहीं तो लायलपुर फ़ैसलाबाद क्यों हो गया?
नए नाम का चलन
नाम बदलना और बात है और नए नाम का चलना और बात। कराची में एक रिक्शेवाले से मैंने पूछा कि भई सर शाह मोहम्मद सुलेमान रोड चलने के कितने पैसे लोगे? उसने पूछा, ये गज भर नाम वाला रोड है कहां साहब?
जब मैंने उसे नक्शा समझाया तो वो घूरते हुए कहने लगा, ''साहब सीधा-सीधा उर्दू में कहो ना कि विक्टोरिया रोड जाना है हमें सर शाह मोहम्मद सुलेमान रोड बताने का क्या मतलब है?''
पर जैकबाबाद वालों ने तो कमाल ही कर दिया। जियाउल हक़ के जमाने में उसका नाम याक़ूबाबाद बदलने की योजना चली। मगर जैकबाबाद डिस्ट्रिक्ट काउंसिल ने हज़ारों दस्तखत करवा के एक ज्ञापन इस्लामाबाद भिजवा दिया कि हम अपने शहर का नाम नहीं बदलने देंगे।
क्या है दोष
ये शहर जिसने बसाया, उसी के नाम पर रहेगा। अगर जॉन जैकब अंग्रेज था तो इसमें हमारा क्या दोष? बहुत साल पहले जब मैं जैकबाबाद गया तो देखा कि जॉन जैकब की क़ब्र पर लिखा था, ''आस्तानाएं मुबारक हज़रत जॉन जैकब साहब'' उनके क़ब्र पर बेरी लगी हुई थी उसकी शाखों में कई रंगीन पट्टियां बंधीं थीं।
मैंने कब्र की देख-रेख करने वाले से पूछा ये पट्टियां कौन बांध जाता है? कहने लगा जिनके यहां औलाद नहीं होती वे मुर्शद जैकब साहब की कब्र पर आकर मन्नत मांगते हैं कि अगर मुराद पूरी हुई तो बेरी से पट्टी बांधूंगा और कब्र पर 40 दिये भी जलाऊंगा।
तो जिनके यहां लड़की होती है वो लाल पट्टी बांध जाते हैं और जिनके यहां लड़का होता है तो वे हरी पट्टी बांध देते हैं। मैंने बेरी के पेड़ को नजर भरकर देखा कि सिर्फ सात लाल पट्टियां लटक रही थीं और बाक़ी सब हरी थीं।
1965 के युद्ध के बाद रेडियो पाकिस्तान से फिराक़ गोरखपुरी की ग़ज़लें बजनी बंद हो गईं थीं, पता चला कि अब किसी भी हिंदुस्तानी शायर का कलाम नहीं बजेगा।
किसी ने रेडियो पाकिस्तान, कराची की दीवार से इश्तिहार चिपका दिया कि फिराक गोरखपुरी को नहीं बजाते तो गालिब और इकबाल पर भी पाबंदी लगा दो, वो भी हिंदुस्तानी थे। कुछ साल बाद रेडियो पाकिस्तान ने फिराक साहब को फिर से पाकिस्तानी मान लिया।