गुजरात में गैंग रेप का शिकार हुई युवती को आने वाले दिनों में एक बड़ी लड़ाई से रूबरू होना है। पीड़िता का आरोप है कि उसे अग़वा कर आठ महनों तक गैंगरेप किया गया। पिछले हफ़्ते कोर्ट ने बच्चा गिराने की उनकी याचिका ख़ारिज कर दी थी।
दो बच्चों की ये मां अपने समुदाय में होने वाले एक रिवाज को लेकर सहमी हुई हैं। ये रिवाज है 'चोखा थावा नी विद्धि' (शुद्धिकरण की प्रक्रिया)।
इसके तहत उन्हें अपने समुदाय के सामने अपनी 'पवित्रता' साबित करनी होगी ताकि उनका समाज उन्हें फिर से अपना सके।
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ये पीड़िता गुजरात की देवीपूजक समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। ब्रितानी राज में इस समुदाय को 'आपराधिक आदिवासी समुदाय' क़रार दिया गया था हालांकि आज़ादी के बाद ये सरकारी आदेश वापस ले लिया गया। जाति और धर्म को लेकर ये समुदाय बेहद संवेदनशील रहा है। समाज की पंचायत कई मामलों पर अपने फ़ैसले देती है और इसमें किसी ग़लती से लेकर बलात्कार तक के मामले होते हैं।
रिवाज पर अमल
'शुद्धिकरण' का ये रिवाज अब केवल गुजरात के कुछ गांवों में देवीपूजक समुदाय तक ही सीमित रह गया है। पीड़िता ने अपने समुदाय में इस रिवाज से लड़कियों और अन्य महिलाओं को गुजरते हुए देखा है।
पीड़िता बताती हैं, "जब बच्चे की जचगी हो जाएगी तो समाज के लोग इस रिवाज को अमल में लाने की तारीख़ तय करेंगे। सौ से दो सौ लोगों की भीड़ में वे देखेंगे कि जो मैं कह रही हूं वो सही है या नहीं।"
उन्होंने कहा, "अगर मैं ग़लत हुई तो देवी उन्हें बता देंगी। कई रीतियों में से एक के दौरान 10 किलो का एक पत्थर मेरे सिर पर रख कर मुझे घंटों खड़ा रहने के लिए कह दिया जाएगा।"
वह कहती हैं, "मैं वो पत्थर तभी हटा सकती हूं जब देवी उनसे मेरे सच बोलने के बारे में कहेंगी। और अगर मैं नाकाम रही तो वे मेरा बहिष्कार कर सकते हैं और मेरे परिवार को भी इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।"
जूतों की माला!
पीड़िता के पति सूरत में ठेलागाड़ी चलाते हैं। वे कहते हैं, "हम बच्चे को रखने के बारे में या उसे सरकार को देने के बारे में कोई फ़ैसला नहीं कर सकते। समाज का फैसला आखिरी होगा और ये सब कुछ 'शुद्धिकरण' की प्रक्रिया के दौरान तय किया जाएगा।"
उन्होंने कहा, "एक बार जब मेरी पत्नी को पवित्र घोषित कर दिया जाएगा, हम सामान्य जीवन जी सकेंगे और तब हमें किसी तरह के बहिष्कार का सामना नहीं करना होगा।" वे कहते हैं, "मुझे अपनी पत्नी की इस बात पर भरोसा है कि उन्हें अग़वा किया गया था और उनका बलात्कार किया गया था। उम्मीद है कि समाज के लोग भी उन पर भरोसा करेंगे।"
सरदार सिंह मोरी पीड़िता के पारिवारिक दोस्त हैं और बलात्कार की शिकायत दर्ज करवाने में उन्होंने परिवार की मदद की। वे बताते हैं, "उन्हें समाज के दूसरे लोगों के सामने साबित करना होगा कि बलात्कार उनकी मर्जी के ख़िलाफ़ हुआ था। इस प्रक्रिया में उन्हें खाना भी बनाना होगा और गले में जूतों की माला भी पहननी होगी।"
सरदार सिंह ने बताया कि ऐसा इम्तिहान केवल समाज की औरतों को देना होता है। उन्होंने कहा, "जब भी किसी पति को अपनी पत्नी पर शक़ होता है या किसी बिनब्याही लड़की पर किसी से संबंध रखने के आरोप लगते हैं तो उस लड़की या महिला को उनकी ग़लतियों से मुक्त करने के लिए शुद्धिकरण की प्रक्रिया की जाती है।"
सही जवाब!
सरदार सिंह कहते हैं, "पुरुषों के मामलों में भी उनके सच या झूठ को परखने के लिए समाज की पंचायत जांच करती है लेकिन 'शुद्धिकरण' की कोई बात नहीं होती।"
ओधा भाई देवीपूजक इसी गांव के बुजुर्ग हैं। वे कहते हैं, "तांत्रिक चुटकी भर जोवार के बीज लेगा और पीड़िता से एक सवाल पूछेगा। जवाब देने के बाद पीड़िता को बताना होगा कि बीजों की कुल संख्या सम है या विषम।"
उन्होंने बताया, "अगर वो सही हुईं तो अगला सवाल पूछा जाएगा और ग़लत होने की सूरत में वही सवाल तब तक पूछा जाता रहेगा जब तक कि वो सही जवाब नहीं दे देती हैं। इसके बाद उन्हें जूतों की माला पहननी होगी और दस किलो का पत्थर अपने सिर पर रखना होगा।"
ओधा भाई कहते हैं कि पीड़िता को अपने सिर पर पत्थर तब तक रखना होगा जब तक कि सम या विषम संख्याओं वाले सवाल का वो सही जवाब नहीं दे देती हैं। उन्होंने बताया, "कई बार तो 'शुद्धिकरण' की प्रक्रिया में महीनों लग जाते हैं क्योंकि शुरुआत में लोग झूठ बोलते हैं लेकिन देवी सब जानती हैं और आख़िरकार उन्हें सच बोलना ही होता है।"
ओधा भाई बताते हैं कि उनके समाज में ये रिवाज सालों पहले तब शुरू हुआ था जब अदालतों और पुलिस का वजूद नहीं था। उन्होंने कहा, "जब पीड़िता 'शुद्ध' हो जाती हैं और परीक्षा से पाक-साफ़ गुज़र जाती हैं तो कोई उन पर अंगुली नहीं उठा सकता है और फिर उन्हें या उनके परिवार को समाज से निकाला भी नहीं जाएगा।"
'देवी' की पूजा
ओधा भाई कहते हैं, "लेकिन अगर पीड़िता इम्तिहान में पास नहीं हो पाती हैं तो देवी कहेंगी कि वो 'अशुद्ध' हैं और इसके बाद उन्हें समाज से बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है।" जाने-माने समाज विज्ञानी अच्युत याग्निक कहते हैं कि देवीपूजक समुदाय अंधविश्वासों और टोने-टोटकों से ग्रसित है।
अच्युत बताते हैं, "मैंने किसी ऐसे रिवाज के बारे में नहीं सुना है लेकिन इस समुदाय में ऐसी प्रथाएं हैं। देवीपूजक का मतलब देवी की उपासना करने वाले लोगों से है और इस समुदाय में अंधविश्वास व्याप्त हैं।"
जाति से बाहर?
लेकिन इस बीच पीड़िता तनाव में हैं और शुद्धिकरण वाले इस रिवाज को लेकर हिली हुई हैं और उनके परिवार को लगता है कि उन्हें इससे गुज़रना ही होगा। पीड़िता की मां कहती हैं, "मेरे दो और बच्चे भी हैं जिनकी शादी नहीं हुई है। अगर वो (पीड़िता) बच्चे को जन्म देती हैं तो मेरे बच्चों से कोई शादी नहीं करेगा।"
वो बताती हैं, "मेरे 14 साल के बेटे को जाति से बाहर कर दिया जाएगा। अब केवल यही रास्ता बचा है कि मेरी बेटी इस रिवाज का सामना करे और समाज का जो कुछ भी फ़ैसला होगा, आख़िरी होगा।"
उन्होंने कहा, "मैं चाहती हूं कि सरकार गर्भ में पल रहे बच्चे की जिम्मेदारी ले और अभियुक्तों को गिरफ्तार करे।" वो कहती हैं, "बच्चे के जन्म के ठीक बाद मेरी बेटी का 'शुद्धिकरण' किया जाएगा और उसके बाद ही हम सामान्य जीवन जी सकेंगे। क्योंकि मैं जानती हूं कि मेरी बेटी बलात्कार के बारे में झूठ नहीं बोल रही है।"
लेकिन अग़वा करने वालों की गिरफ़्त से भागने में कामयाब होने वाली पीड़िता की क़िस्मत अभी भी परंपरा, रीति रिवाजों, क़ानूनी कार्रवाई और परिवार की उम्मीदों पर टिकी है।