16 दिसंबर के बाद राजधानी में रेप के खिलाफ हुए प्रदर्शनों की तस्वीर अब भी जहन में है।
रेप के खिलाफ युवाओं में फूटा आक्रोश याद है। रायसिना हिल, इंडियागेट और विजय चैक पर उमड़े युवा, सामाजिक जड़ता को चुनौती देते उनके नारे, नई आजादी का मार्च और कानून व व्यवस्था के खिलाफ उनका गुस्सा याद है।
दिल्ली पुलिस याद है तो केवल राजपथ पर पानी की बौछारों, आंसूगैस के गोलों और लाठीचार्ज के लिए।
इंटरनेट पर वायरल हुई एक तस्वीर भी याद है। पुलिस की लाठी से बचती गहरी नीली जिंस और ग्रे ब्लेजर में एक लड़की, इंडिया गेट पर पुलिस के हुजूम से घिरी हुई।
गांधीनगर इलाके में पांच साल की बच्ची के साथ हुई वारदात के बाद राजधानी में एक बार फिर रेप के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं।
अपना वही पुराना गम-ओ-गुस्सा नई तख्तियों और नए नारों के साथ लेकर लोग फिर सड़कों पर उतर पड़े हैं।
हालांकि इस बार तस्वीर 16 दिसंबर से अलग है।
आम आदमी पार्टी दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर चार दिनों से प्रदर्शन कर रही है। भाजपा कार्यकर्ता संसद तक मार्च कर चुके हैं। एम्स के बाहर, जंतर मंतर और इंडियागेट पर भी कई संगठनों ने टुकड़ों-टुकड़ों में प्रदर्शन किया है।
फिर भी इन प्रदर्शनों से 16 दिसंबर का युवा चेहरा नदारद है।
प्रदर्शन में क्यों नहीं युवा
गांधी नगर की वारदात के बाद आम आदमी पार्टी और इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने फेसबुक पर आईटीओ स्थिति दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन की सूचना दी थी।
मुझे याद है, 29 दिसंबर की सुबह जब बिटिया की मौत की खबर फैली, जंतर मंतर पर कई संगठनों ने अपनी श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की।
जंतर मंतर के लिए जा रही डीटीसी बस में मैं बैठा तो ऐसा लग रहा था कि मानो हर कोई वहीं जा रहा हो, जो वहां नहीं जा रहे थे, वो बातें वहीं की कर रहे थे।
बिटिया की मौत और देश भर में उमड़ा गुस्सा सभी की जुबान पर था।
हालांकि इस शनिवार दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर पर हो रहे प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए प्रगति मैदान से आईटीओ की ओर बढ़ा तो न वो गुस्सा दिखा और न वो जोश।
आईटीओ चौराहे पर लगे लंबे जाम के बीच ऐसा कोई नजर नहीं आ रहा था, जो मुनिया के लिए इंसाफ मांगने आया हो।
ये माहौल 16 दिसंबर के बाद उभरे आक्रोश से बिलकुल अलग था। आम दिनों जैसा, सड़क पर लोग ऑफिस खत्म करके घर जाने की जल्दबाजी में थे।
लोगों की बातों में बॉलीवुड था और जो चुप थे, वो चुप ही थे।
एक बारगी तो यह लगा कि टीवी पर जिन प्रदर्शनों का शोर है, वे दिल्ली में नहीं कहीं और हो रहे हैं। खैर, ये भ्रम जल्दी ही टूटा। आईटीओ चैराहे से पुलिस हेडक्वार्टर की ओर मुड़ा तो ओबी वैन की छतरियां देख तसल्ली हुई।
धीरे-धीरे कुछ खाकी वर्दियां दिखीं। पुलिसवालों की संख्या इतनी थी कि उन्हें भारी ‘पुलिस बन्दोबस्त’ कहा जा सकता है।
हालांकि इनके बीच प्रदर्शनकारियों की संख्या मुट्ठी भर थी। पुलिस मुख्यालय के सामने आम आदमी पार्टी की टोपी लगाए लोग लगभग 70 साल की एक बुढि़या के इर्द-गिर्द घेरा बनाकर बैठे थे।
10 साल की एक बच्ची हाथ में माइक लिए नारा लगा रही थी- नीरज कुमार, पीछे से भीड़ दोहरा रही थी-इस्तीफा दो।
इस घेरे से हटकर दूसरी ओर बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले एक एनजीओ की कुछ महिला सदस्य प्रदर्शन कर रही थीं। उनकी मांग थी-गृहमंत्री का इस्तीफा। इस भीड़ में कुछ लड़कियां भी थीं।
16 दिसंबर के बाद हुए प्रदर्शनों से अलग ये ऐसा प्रदर्शन था, जिसमें युवाओं का जोशीला चेहरा नदारद था। प्रदर्शनों में जो युवा थे भी, वे वहां खड़ी भीड़ का हिस्सा भर थे।
इन प्रदर्शनों में खास बात यह भी है कि इनमें राजनीतिक दल, चुनाव और वोट पहले आया और मुनिया, रेप और कानून व्यवस्था का मुद्दा बाद में।
पुलिस को उकसा रही थी भीड़
‘यार सुना हुआ है लाठी चारज हलका-हलका होता है’, प्रगतिशील आंदोलनों से निकले इस गीत को आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की जुबान से सुनकर थोड़ा अचरज होता है।
हालांकि आप ने आंदोलनों के इन तरीकों को बखूबी अपनाया है। ढपली की थाप पर जनगीतों के बीच नारे लगाते उनके कार्यकर्ता एक पल को उत्साह से भर देते हैं।
पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शनकारियों का एक और चेहरा भी दिखा। पुलिस की ओर चूड़ियां उछालने की तस्वीरें टीवी पर पहले भी देख चुका था लेकिन इन प्रदर्शनों में ऐसी भीड़ देखी जो पुलिस को उकसाती नजर आई।
16 दिसंबर के बाद के आंदोलन के बर्बर दमन का आरोप झेल रही दिल्ली पुलिस इस बार तनिक संयमित दिखी।
पुलिस मुख्यालय के सामने हो रहे प्रदर्शनों में पुलिसकर्मी इस बार मूकदर्शक ही बने रहे हालांकि भीड़ में ऐसे तत्व भी थे, जो बैरिकेटिंग के उस पार खड़े पुलिसकर्मियों पर फिकरे कस रहे थे।
जब मैं पुलिसकर्मियों की फोटो ले रहा था लगभग 6 फीट का एक आदमी मेरे बगल में आया और चिल्लाया, ‘एक-एक बीड़ी के लिए बिक जाते हैं ये.....!’
वह मेरी ओर पलटा और एक पुलिसकर्मी को ओर इशारा कर चिल्लाया, 'देखो, हंस रहा है....। इसकी बेटी होती तो...इसकी फोटो लो....भाई साहब....इसकी फोटो लो।
प्रदर्शन का ये कैसा तरीका था, ये समझ से परे था। उस भीड़ से और भी कई चेहरे निकले, और भी कई फिकरे सुने।
ये कार्यकर्ता संभवतः किसी दल के ना हों, आम आदमी हों। संभवतः इनके चेहरे सामने आएं तो पार्टियां इन्हें अपना सदस्य मानने से भी इनकार कर दें।
लेकिन पार्टियां कम से कम प्रदर्शनों के पहले अपने कार्यकर्ताओं को ये तो बता ही सकती हैं कि वर्दी उतारने के बाद एक पुलिसकर्मी भी उन्हीं की भीड़ का हिस्सा हो जाता है।
उसकी जिंदगी की चुनौतियां भी वैसी होती हैं जैसी की औरों की।
खैर, 16 दिसंबर की वारदात के बाद कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली बहस के दायरे में थी तो इस बार समाज के मूल्य, मानवता और नैतिकता।
ये एक कड़वी सचाई है कि 97 फीसदी रेप परिचित ही करते हैं। इन 97 फीसदी रेप को रोका जा सकता है अगर समाज खुद को झिंझोंड़े और अपने भीतर झांक कर जानने की कोशिश करे कि रेप की वजहें क्या हैं?