सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि बलात्कार के मामले में महिला के स्वच्छंद चरित्र के होने की बात अप्रासंगिक है और बलात्कारी इस बात को अपने बचाव में ढाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकता है।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वच्छंद चरित्र की महिला को भी जीने का पूरा हक है।
जस्टिस बीएस चौहान और जस्टिस एफएमआई कलीफुल्ला की पीठ ने कहा कि बलात्कार सिर्फ एक महिला के खिलाफ किया गया अपराध नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के खिलाफ किया गया अपराध है।
साथ ही पीठ ने कहा कि अदालत इस तरह के मामलों से गंभीरता और कड़ाई से निपटेगी। पीठ ने कहा कि अगर महिला पहले ही अपना कौमार्य खो चुकी हो तो भी किसी को उसके साथ बलात्कार करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता।
ऐसे में बलात्कार के मामले में इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि महिला स्वच्छंद चरित्र की है। यह बात इस तरह के मामले में पूरी तरह से अप्रासंगिक है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह आदेश बलात्कार मामले में आरोपी की ओर से अपनी सजा को चुनौती देने वाली याचिका पर दिया।
आरोपी ने महिला के स्वच्छंद चरित्र के होने और शारीरिक संबंध बनाने की आदी होने के आधार पर अपने सजा को चुनौती दी थी।
बहरहाल, पीठ ने आरोपी को किसी तरह की राहत देने से साफ इंकार कर दिया। पीठ ने कहा कि महिला के शारीरिक संबंध के आदी होने से इस मामले का कोई लेना देना नहीं है।
स्वच्छंद चरित्र के होने के बावजूद महिला को यह अधिकार है कि वह किसी से शारीरिक संबंध बनाने से इंकार कर सकती है, क्योंकि वह कोई वस्तु नहीं है जिसका जो चाहे उपभोग कर ले।
पीठ ने कहा कि अदालत इस तरह के मामलों से गंभीरता और कड़ाई से निपटेगी। यौन हिंसा अमानवीय कृत्य होने के साथ ही किसी महिला की गोपनीयता और पवित्रता के अधिकार का भी उल्लंघन है।