नरेंद्र मोदी के बारे में वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक रामबहादुर का कहना है कि यह व्यक्ति एक-एक क़दम चलकर इस मुकाम पर पहुंचा है। पढ़िए रामबहादुर का एक विश्लेषण।
नरेंद्र मोदी को 1971-72 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के तौर पर पहले-पहल मान्यता मिली। उससे पहले तक नरेंद्र मोदी संघ के कार्यालय में बाक़ी कामकाज देखा करते थे।
मैं भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी जैसा दूसरा उदाहरण दूं, तो वह होगा नंबूदरीपाद का। नंबूदरीपाद ने भी मुख्यमंत्री बनने से पहले 13 साल तक सीपीआई के कार्यालय में काम किया था।
नरेंद्र मोदी ने संघ में रहकर जिस तरह से काम किया है, उस आधार पर मुझे लगता है कि यह आदमी बहुत विस्तार से और सघन योजनाएं बनाने में माहिर है।
मोदी को रोकने की कोशिश
भारतीय राजनीति में 1952 के आम चुनावों के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है, जब यह धारणा ग़लत साबित हो रही है कि सूबे की राजनीति करने वाला कोई नेता दिल्ली नहीं पहुंच सकता।
यह भी सच है कि नरेंद्र मोदी को उनकी अपनी भारतीय जनता पार्टी के नेता 2007 से ही रोकने की कोशिश कर रहे थे। आपको एक घटना बताता हूं। बहुत कम लोगों को याद होगा। यह वर्ष 2007 की बात है।
तब राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड से हटा दिया था। राजनाथ सिंह ने तब ऐसा अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर किया था।
विश्व हिंदू परिषद भी मोदी की राह पर..
सच यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद ने भी रोकने की कोशिश की थी।
लेकिन अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने जो ज़मीन बनाई, उसे सबसे पहले जिस नेता ने समझा, वह नरेंद्र मोदी ही थे।
नरेंद्र मोदी 2012 के नवंबर-दिसंबर में जैसे ही गुजरात में विधानसभा का फिर से चुनाव जीते, तब नरेंद्र मोदी ने गुजरात के लोगों को यह संदेश दिया था कि आप मुख्यमंत्री नहीं चुन रहे हो, बल्कि आप प्रधानमंत्री चुनने जा रहे हैं।