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राहुल हुए 'फेल', कांग्रेस में नई जान फूंकने को प्रियंका ने थामी कमान

Sat, 19 Apr 2014 07:29 AM IST
सुजय महदूदिया/अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रियंका गांधी भले ही चुनावी मैदान में प्रत्यक्ष तौर पर न उतरी हों, लेकिन उन्होंने कांग्रेस के ‘चुनावी वार रूम’ का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है।
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माना जा रहा है कि कांग्रेस के पुराने नेताओं और राहुल गांधी की युवा बिग्रेड के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रियंका ने यह फैसला किया है। प्रियंका की कोशिश पार्टी में शीर्ष नेताओं से ‘संपर्क’ न कर पाने की शिकायत को सुलझाना भी होगा।
 
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि ओपिनियन पोल में पार्टी की स्थिति कुछ खास नहीं दिख रही है और पार्टी का प्रचार अभियान भी अपनी धार खोता जा रहा है, ऐसे में प्रचार में नई ऊर्जा के संचार की जरूरत महसूस की जा रही थी।
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कांग्रेस मान रही शुभ संकेत

कांग्रेस इसे एक शुभ संकेत के रूप में ही देख रही है। पार्टी में अक्सर यह शिकायत आम हो रही है कि आम कार्यकर्ता तो क्या सांसद तक का संपर्क शीर्ष नेतृत्व से नहीं हो पा रहा है।

दिल्ली के 15, रकाबगंज रोड़ स्थित चुनावी वार रूम की कमान प्रियंका गांधी ने औपचारिक रूप से संभाल ली है। माना जा रहा है कि राहुल की टीम और पुरानी टीम के बीच मतभेद होने के चलते चुनावी अभियान भी प्रभावित हो रहा है।

एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा, ‘अब प्रियंका ने कमान संभालने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ गलतफहमियों को दूर कर अभियान को धार देने का काम शुरू कर दिया है। आम आदमी पर फोकस के साथ यह अभियान अभी से ही अपना असर भी दिखाने लगा है।’

विवाद सुलझाने में जुटीं प्रियंका

प्रियंका की तुलना अक्सर उनकी दादी इंदिरा गांधी से की जाती है। वह पार्टी के महासचिवों से नियमित तौर पर बैठक कर रणनीति पर चर्चा और अभियान को पैना करने में जुटी हुई हैं।

पार्टी के वरिष्ठ नेता ने बताया, ‘प्रियंका गांधी और अहमद पटेल हर रोज चुनावी वार रूम में बैठक कर चर्चा कर रहे हैं और चुनावी रणनीति तैयार कर रहे हैं। उम्मीदवारों को व्यक्तिगत तौर पर भी प्रियंका खुद दिशा निर्देश दे रही हैं। देश के अन्य हिस्सों में आपसी विवाद सुलझाने के लिए पार्टी महासचिवों को भेजा गया है।’

कांग्रेस के एक महासचिव ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि प्रियंका गांधी ने उन्हें दिल्ली में बैठने की बजाय एक राज्य विशेष में जाकर विवाद सुलझाने को कहा है। कांग्रेस के चुनावी अभियान को नई दिशा देने के लिए स्थानीय नेताओं और राष्ट्रीय नेताओं को फिर से चुनावी ड्यूटी पर लगाया जा रहा है। प्रियंका गांधी ने यह नई भूमिका ऐसे समय में संभाली है, जब चर्चा थी कि वह बनारस से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की इच्छुक थीं।

राहुल नहीं कर पा रहे थे प्रेरित

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, ‘राहुल गांधी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ऐसा लग रहा है कि वह 2014 चुनावों में जीत की आस छोड़ चुके हैं और वह 2019 के चुनावों की तैयारी कर रहे हैं।

मीडिया में आए उनके इंटरव्यू और बयान पार्टी कैडर को प्रेरित नहीं कर पा रहे हैं। इसी वजह से प्रियंका गांधी को कमान संभालनी पड़ी।’

हाल ही में सोनिया गांधी द्वारा रैलियों में एनडीए और भाजपा पर लगातार तेज हुए तीखे हमले और जारी विशेष बयान भी प्रियंका गांधी के ही दिमाग की उपज है।

वरिष्ठ नेताओं की शिकायत करेंगी दूर

प्रियंका की पहली कोशिश वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी को दूर करने की होगी। सतपाल महाराज और जगदंबिका पाल के पार्टी छोड़ने के पीछे भी यही कारण माना जा रहा है।

चर्चा है कि सतपाल महाराज को पिछले एक साल से सोनिया गांधी से समय नहीं मिलने से वह निराश हो गए थे और इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला लिया।

कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं और सांसदों की भी यही शिकायत है, उन्हें लगता है कि राहुल गांधी एक मंडली से घिरे रहते हैं, जिससे उनसे मिलना लगभग नामुमकिन हो गया है। इसी वजह से उन्हें सही स्थिति का पता नहीं चल पाता।
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पार्टी में महसूस की जा रही प्रियंका की मौजूदगी

प्रियंका गांधी की मौजूदगी को पार्टी में महसूस किया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से प्रतिदिन मुलाकात के अलावा वह जनार्दन द्विवेदी, आनंद शर्मा, अजय माकन और कभी भी पी चिदंबरम व एके एंटनी से बैठक कर रही हैं।

इसके चलते अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी पूरी तरह से अपना ध्यान फील्ड लगा पा रहे हैं। उन्हें पार्टी की अंदरूनी मामले सुलझाने की चिंता करने की जरूरत नहीं है।
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