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जापान की धरती से मोदी का चीन पर हमला

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जापान दौरे पर रवाना होने से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की वार्ता पहल का तमाशा बनाने पर पाकिस्तान को खरी खोटी सुनाई थी।
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जापान की सरजमीं से सोमवार को उन्होंने पाक को शह देने और भारतीय सरजमीं पर दावा और घुसपैठ करने वाले चीन पर अप्रत्यक्ष रूप से करारा हमला बोला।

प्रधानमंत्री ने दूसरों के सागर और सरजमीं में अतिक्रमण करने की कुछ देशों (चीन) की विस्तारवादी नीति की आलोचना की। उनकी यह टिप्पणी इसलिए काफी अहमियत रखती है क्योंकि चीन का जापान के साथ समुद्री विवाद चल रहा है।

भारत और जापान के उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि पूरी दुनिया स्वीकार करती है कि 21वीं सदी एशिया की होगी लेकिन एक बड़ा सवाल है कि आखिर 21वीं सदी कैसी होनी चाहिए। हमें इसका उत्तर देना है।
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यह इस पर निर्भर करता है कि हमारे (जापान और भारत के मध्य) संबंध कितने गहरे हैं। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में बिना नाम लिए चीन की विस्तारवादी नीतियों की जमकर आलोचना की। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में भी कुछ देश 18वीं सदी की सोच रखते हैं।

अधिकार क्षेत्र में घुसकर अतिक्रमण कर रहा चीन

ऐसी मानसिकता रखने वाले देश आए दिन दूसरों के अधिकार क्षेत्र में घुसकर अतिक्रमण कर रहे हैं। चीन का भारत, जापान, वियतनाम, फिलीपींस और अन्य कुछ देशों के साथ क्षेत्रीय विवाद चल रहा है। प्रधानमंत्री के बयान को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने विस्तार वाद की जगह विकास वाद को आगे ले जाने के लिए भारत और जापान के बीच करीबी एवं घनिष्ठ संबंधों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत और जापान को मानवता की जरूरतों को पूरा करने के लिए शांति और प्रगति को बढ़ावा देना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों देशों के पास एक बड़ी जिम्मेदारी है। यह केवल सरकारों और नेताओं की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि कारोबारी जगत की भी जिम्मेदारी है कि वह यह देखें कि विश्व कहां जा रहा है।

शांति एवं प्रगति के लिए कारोबारी जगत को एक बड़े प्रेरणा बल के रूप में देखते हुए मोदी ने कहा कि भारत मानवता की भलाई के लिए भूमिका निभाना चाहता है।

विस्तार वाद या विकास वाद

हमें यह फैसला लेना होगा कि हम विकास वाद चाहते हैं या विस्तार वाद, जो विघटन की ओर ले जाता है। भगवान बुद्ध के मार्ग पर चलने वाले और विकास वाद पर आस्था रखने वाले विकास करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा लेकिन हम देख रहे हैं कि जो 18वीं सदी के विचार रखते हैं, वे अतिक्रमण में शामिल हैं और दूसरों के समुद्र क्षेत्र में घुसपैठ कर रहे हैं।

भारत की जमीन पर दावा
भारत और चीन के बीच 4000 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) है। चीन अरुणाचल प्रदेश की करीब 90 हजार वर्ग किमी और जम्मू कश्मीर की 38 हजार वर्ग किमी भूमि पर अपना दावा जताता है।

इसके अलावा बीजिंग आए दिन भारतीय सीमा में घुसपैठ करता रहता है। साथ ही भारत के दक्षिण चीन सागर में मौजूदगी को लेकर भी हमेशा विरोध प्रकट करता रहा है।

द. चीन सागर में मौजूदगी पर भी विवाद

चीन दक्षिण चीन सागर में भारतीय कंपनियों की मौजूदगी को लेकर हमेशा से विरोध करता रहा है। भारतीय कंपनियां वियतनाम और अन्य देशों के लिए इस सागर में तेल, गैस खोज का काम करती हैं।

इसके अलावा पूर्वी चीन सागर में द्वीप विवाद और समुद्र के नीचे गैस भंडार के दोहन को लेकर जापान तथा चीन के बीच संबंध तनावपूर्ण हैं।

चीन दक्षिण चीन सागर के 90 प्रतिशत हिस्से पर भी अपना हक जताता है जहां तेल और गैस के भंडार बताए जाते हैं। ब्रुनेई, मलयेशिया, वियतनाम, फिलीपींस और ताइवान भी दक्षिण चीन सागर के हिस्सों पर अपना दावा जताते हैं।
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चीन ने दी मोदी के बयान पर प्रत‌िक्रिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कुछ देशों में ‘विस्तारवाद’ की प्रवृति होने संबंधी बयान पर चीन ने बेहद सतर्कता से टिप्पणी की है। चीन ने कहा है कि उनके बयान से स्पष्ट नहीं है कि वह किस संबंध में बात कर रहे हैं।

साथ ही उसने मोदी की पिछली टिप्पणियों को याद दिलाई, जिसमें भारत और चीन को सामरिक भागीदार बताया था। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता किन गांग ने कहा, ‘हमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के बारे में प्रासंगिक सूचना है।

आप जिस टिप्पणी की बात कर रहे हैं, मैं उसके बारे में नहीं जानता हूं। मुझे नहीं पता कि वह किस संबंध में बात कर रहे हैं। मगर मैं मोदी के शब्दों के आधार पर इस सवाल का जवाब दे सकता हूं।

उन्होंने कहा था कि चीन और भारत समान विकास के लिए सामरिक साझीदार हैं। दोनों देशों के बीच अच्छे पड़ोसी के रिश्ते और सहयोग पूरी दुनिया तथा मानवता की खुशहाली के लिए बहुत अहम हैं।’
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