राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में जारी अपनी आत्मकथा में सवाल उठाया है कि क्या प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री को व्यक्तिगत रूप से उद्योगपतियों से मिलना चाहिए या नहीं। हालांकि, किताब में इस सवाल का उन्होंने खुद ही जवाब भी दिया है।
उन्होंने लिखा है कि वित्त मंत्री रहते हुए समूह में या व्यक्तिगत रूप से उद्योगपतियों से उनकी मुलाकात बहुत महत्वपूर्ण रही। वित्त मंत्री और वाणिज्य मंत्री रहते हुए उन्होंने ऐसा किया, जबकि राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहे पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह उद्योगपतियों के साथ निजी मुलाकात के खिलाफ थे।
वर्ष 1988 से 1991 के बीच की अवधि का जिक्र करते हुए मुखर्जी ने अपनी और वीपी सिंह की सोच में अंतर का उल्लेख किया है। इस अवधि को देश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर माना जाता है। मुखर्जी ने लिखा है कि इस मामले में उनके विचार अलग हैं। वित्त मंत्री या वाणिज्य मंत्री के रूप में सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से उद्योगपतियों से उनकी मुलाकात काफी फायदेमंद रही। इससे किसी खास संदर्भ को समझने में मदद मिली। दूसरे शब्दों में राष्ट्रपति ने सवाल किया है कि कैसे एक वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री उद्योगपतियों से मिल सकते हैं।