ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से यूं तो दुनिया का कोई भी देश अछूता नहीं होगा, लेकिन इसकी सबसे ज्यादा मार गरीब देशों पर पड़ने वाली है। विश्व बैंक के अनुसार भविष्य में उन्हें खाने की कमी, सूखा, तूफान और समुद्र तल के बढ़ते स्तर की समस्याओं से जूझना पड़ेगा।
वैश्विक विकास के लिए कर्ज देने वाले बैंक के नए अध्यक्ष जिम योंग किम ने जलवायु परिवर्तन के विकास के लिए आक्रामक कदम उठाते हुए विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। किम ने कहा, ‘अगर हम जलवायु परिवर्तन की समस्या से नहीं निबट सकते हैं, तो हम कभी गरीबी दूर नहीं कर सकते। सामाजिक न्याय में यह हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है।’
‘टर्न डाउन द हीट’नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सदी के अंत तक दुनिया तापमान 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब दिखने लगे हैं। सितंबर में आर्कटिक सागर में बर्फ रिकॉर्ड स्तर पर नीचे पहुंच चुकी है और पिछले एक दशक में अमेरिका और रूस को आए दिन गर्म हवाओं के भीषण तूफान से जूझना पड़ा है।
विश्व बैंक के मुताबिक अगर तापमान 4 डिग्री तक बढ़ता है, तो इस तरह की आपदाएं अक्सर देखने को मिल सकती हैं। अगर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए सभी देशों ने मिलकर काम नहीं किया तो इसके भयंकर परिणाम देखने को मिलेंगे। स्थिति यह है कि अगर सभी नियमों का पालन किया जाए तब भी वर्ष 2100 तक दुनिया का तापमान 3 डिग्री तक बढ़ जाएगा।
इस कारण समुद्र का स्तर भी 3 फुट तक बढ़ने की संभावना है, जिससे वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों में बाढ़ का खतरा पैदा हो जाएगा। साथ ही फसलें बर्बाद होने से भुखमरी और गरीबी भी अपना विकराल रूप दिखा सकती है। किम पहले वैज्ञानिक हैं, जो विश्व बैंक के प्रमुख का पद संभालेंगे। उन्होंने 97 फीसदी वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन की सच्चाई से वाकिफ हैं। उम्मीद है कि इस रिपोर्ट के बाद हम नींद से जागेंगे और उचित कदम उठाएंगे।
विश्व बैंक की रिपोर्ट अनुचित
पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर का कहना है कि विश्व बैंक की ओर तापमान में 4 डिग्री बढ़ोतरी की बात करना अनुचित है। खुद विश्व बैंक भारत में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन बढ़ाने वाले कोल और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को फंड दे रहा है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की समिति (आईपीसीसी) कर चुकी है कि तापमान में 2 डिग्री की बढ़ोतरी के गंभीर परिणाम सामने आएंगे। इसलिए 4 डिग्री की बात करने के बजाय तापमान वृद्धि को 2 डिग्री तक सीमित रखने के उपाय करने होंगे।
अर्थव्यवस्था पर पड़ेगी ग्लोबल वार्मिंग की मार
इंडियन क्लाइमेट रिसर्च नेटवर्क से जुड़े इंद्रजीत बोस का कहना है कि मानसून पर निर्भर भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं को ग्लोबल वार्मिंग से गंभीर खतरे हैं। तापमान में वृद्धि से मानसूनी क्षेत्रों में बारिश ज्यादा लेकिन बरसात के दिनों की संख्या घट सकती है, जिससे फसल चक्र और कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अमेरिका और यूरोप के मुकाबले बहुत कम है लेकिन विकासशील देशों की उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर ग्रीन तकनीक अपनाने और उत्सर्जन में कटौती की बाध्यकारी शर्तें मानने का दबाव है। जबकि विकसित देश डरबन समझौते के तहत स्थापित 100 अरब डॉलर के ग्रीन क्लाइमेट फंड में योगदान करने से पीछे हट रहे हैं।
ग्लोबल वार्मिंग से घटेगी कृषि उत्पादकता
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों का दावा है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वर्ष 2050 तक सिर्फ अनाज उत्पादन में पंद्रह से बीस फीसदी की गिरावट आ सकती है। मछली, पशु-पक्षियों के प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ना तय है। इसे देखते हुए आईसीएआर ने गेहूं, चावल, दलहन और तिलहन के ऐसे उन्नत बीजों को विकसित करने के लिए शोध शुरू किया है, जिन्हें कम से कम पानी की जरूरत तो होगी ही, साथ ही उच्च तापमान में भी अधिक उत्पादकता देने में सक्षम होंगे। पशु-पक्षियों पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के लिए भी आईसीएआर के वैज्ञानिक शोध व अनुसंधान मे जुटे हुए हैं।
सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर ड्राईलैंड एग्रीकल्चर के निदेशक डॉ बी. वेंकटेशवर्लू ने बताया कि जलवायु परिवर्तन से बढ़ने वाले तापमान की आशंका को देखते हुए आईसीएआर के वैज्ञानिकों ने विभिन्न क्षेत्रों पर काम शुरू कर दिया है। अनाज के साथ दुधारू पशुओं और मछलियों पर पड़ने वाले प्रभाव का पता लगाया जा रहा है। पिछले छह दशक के दौरान समुद्र के तापमान ने 0.8 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। इससे मछलियों के प्रजनन पर असर पड़ा है। मानसून की लेट-लतीफी को भी इसी के तहत देखा जा रहा है।