उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन साल की लंबी जद्दोजहद के बाद प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी सीटों पर मुफ्त एडमिशन के लिए गरीब बच्चों की परिभाषा तय कर दी है। अलाभित समूह की श्रेणी में नि:शक्त, अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, एचआईवी व कैंसर पीड़ित अभिभावक के बच्चों तथा निराश्रित व बेघर परिवार के बच्चों को प्राथमिकता दी जाएगी।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई कैबिनेट की बैठक में यह निर्णय किया गया है। दुर्बल वर्ग की श्रेणी में ऐसे बच्चों को रखा गया है, जिनके माता-पिता या संरक्षक गरीबी की रेखा के नीचे के कार्डधारक हैं या फिर ग्राम्य विकास विभाग की सूची में शामिल हैं।
कैबिनेट निर्णय के मुताबिक पात्रता की श्रेणी में विकलांग, वृद्धावस्था, विधवा पेंशन पाने वालों को भी रखा गया है। राज्य सरकार ने सालाना एक लाख रुपये की आय वाले अभिभावकों के बच्चों को भी दुर्बल वर्ग की श्रेणी में रखा है। कन्या विद्याधन योजना के अंतर्गत 35 हजार रुपये की वार्षिक आय वाले अभिभावकों के बच्चों को पहली प्राथमिकता दी जाएगी।
इसके बाद 25 फीसदी सीटों में शेष रिक्त बचने वाली सीटों पर 35 हजार से अधिक सालाना आय वाले अभिभावकों के बच्चों की आरोही क्रम में सूची बनाते हुए एडमिशन दिया जाएगा।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मुताबिक 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू किया। इसके आधार पर राज्यों को नियमावली बनाते हुए बच्चों को निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटों पर मुफ्त एडमिशन देने की व्यवस्था करनी थी।
यूपी में 27 जुलाई 2011 को शिक्षा का अधिकार नियमावली लागू की गई। इसके आधार पर पड़ोसी स्कूलों का चयन भी कर लिया गया, लेकिन गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटों पर मुफ्त एडमिशन का लाभ कैबिनेट निर्णय के आधार पर शासनादेश जारी होने के बाद मिलेगा।