बाबरी मस्जिद ढहे 20 साल बीत गए। बीते 19 वर्षों में अब एक नई पीढ़ी तैयार हो गई है। 20 साल पहले अयोध्या में क्या हुआ था इसकी चर्चा भी नई पीढ़ी नहीं करती। जिन लोगों ने उस समय का मंजर देखा था, वे भी उसे याद नहीं करना चाहते, लेकिन ये सियासत ऐसी है कि उन्हें कुछ भूलने ही नहीं देती।
आज 6 दिसम्बर है, बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी मनाई जा रही है। शौर्य दिवस, स्याह दिवस, काला दिवस, कलंक दिवस, स्वाभिमान दिवस और ना जाने कितने दिवस देश के विभिन्न संगठनों द्वारा मनाया जा रहा है। कई जगह को जुलूस और गोष्ठियां तक आयोजित हो रहे है। कुछ शहरों में आज बाजार बंद हैं।
दरअसल इस देश के राजनीतिक दलों की पूरी कोशिश होती है कि लोग इस हादसे को भूलने न पाएं। राजनीतिक दलों के नेता फिर से लकीर पीट रहे है। उस पर भी लोकसभा चुनाव निकट हैं, लिहाजा इस तैयारी पर सियासत का मुलम्मा चढ़ना स्वाभाविक है।
राजनेताओं और राजनीति के भंवर में फंसी बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर कहीं खुशी तो कहीं गम है लेकिन अयोध्या की आम जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है। आज भी यहां के बाशिंदे एक दूसरे के साथ प्यार और स्नेह से रहते हैं। शायद यही वजह है कि मुस्लिम कारीगरों की तैयार पूजन सामग्री अयोध्या के हर मंदिरों में प्रयोग किए जाते हैं।
बीस साल से राजनीति के शिकार यहां के बाशिंदे चाहे वह मुस्लिम हो या हिन्दू उनके मन में सिर्फ एक ही सवाल है कि आखिर कब भुलेंगे हम इस तारीख को। कब बंद होगी हमारे अमन चैन पर होने वाली राजनीति। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए उपद्रव में जिन लोगों ने अपना सब कुछ खो दिया था वे भी अमन चैन और शांति के पक्षधर हैं। लेकिन ये सियासत ही कुछ ऐसी है कि 6 दिसम्बर को भूलने ही नहीं देती।