मुजफ्फरनगर और शामली में दंगे से पैदा हुई नफरत कम होने लगी है, लेकिन सियासत गरमा गई है। गरमाए भी क्यों नहीं, सियासी दलों की दंगे के बीज से वोट की फसल काटने की जो तैयारी है।
हालांकि, राजनीतिक दलों की हर गतिविधि पर खुफिया नजर है। कवाल में 27 अगस्त को बवाल हुआ। तीन जानें गईं। लखनऊ तक चीख पहुंची। तब किसी दल या सरकार ने उसे गंभीरता नहीं लिया।
उसके बाद राजनीतिक चश्मे से तीनों मौतों को देखा गया। फायदे के लिए सौहार्द बिगाड़ने को सियासतदां जुट गए। 30-31 अगस्त और सात सितंबर को जनता के नुमाइंदों ने सियासत में फायदा उठाने के लिए भीड़ को एकत्र कर खुद को कद्दावर साबित करने की पूरी कोशिश की।
उनकी इसी कोशिश ने कई जिलों में अमन को लील लिया। हुक्मरानों ने कई बड़े सियासतदाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की, लेकिन सिर्फ कागजों तक। उनके गिरेबान तक हाथ पहुंचाने से अफसर बच रहे हैं।
सियासतदाओं की हरकत से नाराज लोगों ने दंगे के बाद फैली नफरत को कम करने की पहल की। राजनीति से दूर अमनपसंदों ने एकता दिखाया।
उन्हें मकसद में कामयाबी मिली। नफरत कम भी होने लगी। यहां नफरत को फैलाने की काम करने वाले राजनीतिज्ञों ने सक्रिय होकर एक बार फिर सियासी माहौल को गरमा दिया।
वोटों की फसल काटने में कोई दल पीछे नहीं
रालोद मुखिया अजित सिंह अपने जनाधार में सेंध लगने से रोकने और दंगे से आहत लोगों की भावनाओं को मरहम लगाकर सहानुभूति हासिल करने के प्रयास सात सितंबर के बाद से शुरू कर दिए।
उन्होंने दो बार यहां आने की नाकाम कोशिश की। उनके सांसद पुत्र जयंत चौधरी कई प्रयास के बाद रविवार को यहां आकर पीड़ितों से मिले और उनके हर दर्द को खुद का दर्द बताया।
हरसंभव मदद मुहैया कराने और इंसाफ दिलाने को संघर्ष करने का भरोसा दिया। अजित-जयंत के सक्रिय होते ही सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने फौरन हमला कर रालोद पर दंगा भड़काने की तोहमत लगा दी। सीएम अखिलेश यादव भी रविवार को यहां पहुंच गए।
उन्होंने दोनों समुदाय के पीड़ितों के जख्मों के लिए दवा देने की कोशिश की। दंगे का दंश झेलने वालों के आश्रितों को नौकरी और मकान दिलाने के साथ ही कई घोषणा कर हमदर्द साबित करने पीछे नहीं रहे।
सीएम के आते ही बेचैन कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व यहां सोमवार को आ पहुंचा। पीएम मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह ने काफी वक्त देकर दो जगह ज्यादातर पीड़ितों का दर्द सुना।
उनको भरोसा दिया कि इंसाफ जरूर मिलेगा। मदद हर हाल में होगी। भाजपा भी पीछे कैसे रहती। उसने वेस्ट के विधायकों के साथ तीन दिन पहले कर्फ्यू के बावजूद जिले में दाखिल होने का प्रयास किया।
पीड़ितों को संदेश दिलाया कि वह पक्षपातपूर्ण कार्रवाई नहीं होने देंगी। बसपा जरूर पूरे मामले में स्थानीय स्तर पर आकर पीड़ितों से सीधे तौर पर नहीं जुड़ी।
हां, दिल्ली और लखनऊ में खुद मायावती और उनका ‘थिंक टैंक’ सरकार और दूसरे दलों पर सीधे हमले कर रहे हैं। सोमवार को इसी मुद्दे पर बसपा ने विधानसभा नहीं चलने दी।
सियासी दलों की चाल पर इंटेलिजेंस की नजर
सियासी दलों की राजनीतिक चाल पर खुफिया विभाग की नजर है। आईबी के आईजी स्तर के अफसर की अगुवाई में एक टीम यहां कैप किए हैं।
वह स्थानीय अभिसूचना इकाई की मदद से हर राजनीतिक दल के प्लान को पता कर रही है। उनके अलावा केंद्र की दूसरी खुफिया इकाइयों के नुमाइंदे भी हैं।
मिलिट्री इंटेलिजेंस भी तैयार कर रही गोपनीय रिपोर्ट
दंग पर काबू पाने में पुलिस के नाकाम रहने के बाद तैनात की गई सेना भी यहां हर गतिविधि पर नजर रख रही है। वह दंगे पर गोपनीय रिपोर्ट तैयार कर रही है।
उसमें प्रशासनिक चूक के साथ राजनीतिक दलों की भूमिका को शामिल बताया जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि सेना जल्द ही यह रिपोर्ट अपने आला अफसरों को सौंप देगी। रिपोर्ट को बाद में केंद्रीय गृह विभाग और सूबे की सरकार को भेजा जाएगा।
पहली बार एकसाथ आए तीनों
मुस्लिमों के हमदर्द दिखाने की कोशिश में कांग्रेस का पूरा नेतृत्व पहली बार सूबे में एक साथ दिखा। पीएम मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी तीनों एक साथ कभी किसी मौके पर सूबे में नहीं दिखे।
लेकिन लोकसभा चुनाव सिर पर देख, दंगे का दंश झेल रहे लोगों का हमदर्द दिखाने का संदेश देने को एक साथ यहां पहुंचे।
उनका सिर्फ एक वर्ग के लोगों के यहां जाकर उनका दर्द जानने को भी मुस्लिम प्रेम दिखाने का हिस्सा माना जा रहा है।