जेएनयू में जो हो रहा है वो कभी कराची यूनिवर्सिटी में भी होता था। मैं खुद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसी इस्लामी जमियते तौलबा का कट्टर समर्थक था और हाथ हिला-हिला कर कहता था कि पाकिस्तान की आख़िरी मंज़िल इस्लामी व्यवस्था है।
ये मुसलमानों का देश है, हमारी अपनी संस्कृति है, इतिहास, परंपराएं और नियम हैं। हमें किसी और की तरफ देखने की कोई ज़रूरत नहीं। जिसने भी इस्लामिक विचारधारा से हटकर बात की हम मुंह तोड़ देंगे, इंकलाब मुर्दाबाद, इंकलाब, इंकलाब, इस्लामी इंकलाब, धर्मनिरपेक्षता, उदारतावाद नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
और फिर हम अपने ही साथ पढ़ने वाले छात्रों को नास्तिक, कम्युनिस्ट, देशद्रोही और इस्लाम का दुश्मन समझकर उनकी पिटाई करते थे तो कभी वो हमें मार भगाते थे।
वक़्त गुज़रता गया और फिर असल ज़िंदगी शुरू हो गई, आज 30-35 वर्ष बाद ये हाल है कि उस ज़माने का अगर कोई नास्तिक, कम्युनिस्ट, देशद्रोही, इस्लाम दुश्मन पुराना साथी मिलता है तो हम एक-दूसरे से ऐसे गले मिलते हैं जैसे बिछड़े हुए सगे भाई हों।